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हौसला न हारेंगे, हम ये बाजी मारंगे

अगर हौसला बुलंद हो तो मुसीबत भी पनाह मांगती है। कड़ी मेहनत के आगे सभी बाधाएं नतमस्तक हो जाती हैं। इसका उदाहरण पेश कर रही हैं जोन्हा की सुनीता और विनिता। दोनों की उम्र 12 वर्ष है।ड्ढr इस छोटी सी उम्र में वे लकड़ी बेचकर कर अपने परिवार का भरन-पोषण करने के साथ-साथ अपनी पढ़ाई कर रहीं हैं। दोनों लड़कियां जोन्हा से लकड़ी बेचने रांची आती हैं।ड्ढr नंगे पैर सिर पर 40 किलो लकड़ी का बोझ लिए रांची के विभिन्न गली-मुहल्लों का चक्कर काटती हैं। जब ग्राहक मिलते हैं, तो उनके चेहर पर खुशी की झलक दिखती है। पूछने पर बताती हैं कि लकड़ी बेचकर हम किताब, कॉपी और पेन खरीदते हैं। दोनों जोन्हा के सरकारी स्कूल में छठी कक्षा में पढ़ती हैं। हर रविवार को छुट्टी रहती है, इसलिए इस दिन लकड़ी बेचने ट्रेन से रांची आती हैं।ड्ढr यहां आने के क्रम में मुसीबतें भी झेलनी पड़ती हैं। ट्रेन में पुलिस वाले 20 से 25 रुपये ले लेते हैं। खा-पीकर 0 से 100 रुपये बचा लेती हैं।ड्ढr अगर ग्राहक नहीं मिला, तो भूखे-प्यासे शहर का चक्कर लगाना पड़ता है। शहर में तो कोई लकड़ी लेता नहीं। सबके यहां गैस चूल्हा है। इसलिए दूर-दराज के मुहल्लों में जाना पड़ता है। वे लकड़ी बेचने अपर चुटिया, कांटा टोली, घाघरा तक जाती हैं। पूछने पर देश के प्रधानमंत्री से लेकर राज्य के शिक्षा मंत्री तक का नाम बेझिझक बताती हैं।

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