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दो टूक

बैंक में खाता होना एक समय किसी के लिए स्टेटस सिंबल की बात होती थी। आज यह जरूरत हो गयी है। यह अलग बात है कि बैंक में खाता खुलवाने के लिए पापड़ भी बहुत बेलने पड़ते थे। देश की बैंकिंग सेवा में बदलाव का दौर साफ दिख रहा है। राष्ट्रीयकृत बैंकों का नया अभियान, गांव-गांव में शाखा, घर-घर में खाता शायद इसी की एक झलक है। पैसे जमा करने की आदत डालने का इससे सुगम प्रयास और क्या होगा? गांव में ही बैंक हो तो दो पैसा जोड़ने के लिए सोचना नहीं होगा। फिर नरगा के लिए लाभुकों का बैंक खाता भी तो अनिवार्य हो गया है। नन बैंकिंग कंपनियों के झांसे से भी भोले-भाले ग्रामीण बचेंगे। आरबीआइ की पहल स्वागतयोग्य है।

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