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चीन से सहयोग

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चीन-यात्रा के दौरान सीमा विवाद के हल में प्रगति भले न हुई हो, लेकिन उनका दौरा अपेक्षाओं से यादा कामयाब रहा है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद दशकों पुराना और जटिल है, जिससे उसका शीघ्र समाधान ढूंढ़ना आसान नहीं। ताजा यात्रा का मुख्य फोकस सीमा विवाद का हल नहीं, बल्कि पारस्परिक संबंधों में घनिष्ठता लाना था और उसमें सफलता मिली। यह दोनों देशों द्वारा अपनाए जा रहे लचीले रवैये का सुफल है और भविष्य में उत्साहवर्धक परिणामों की आशा रखना बेबुनियाद नहीं। मनमोहन सिंह और चीनी प्रधानमंत्री जियाबाओ की शिखर बैठक के बाद जारी साझा घोषणापत्र रेखांकित करता है कि दोनों देश विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग की साझीदारी को व्यापक आधार देना चाहते हैं। उन्होंने असैनिक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देने और सीमा विवाद का स्वीकार्य हल ढूंढ़ने की इच्छा जताई है। परमाणु सहयोग पर सहमति के जरिए चीन ने दो परोक्ष संकेत दिए हैं। पहला, उसने प्रस्तावित भारत-अमेरिकी असैनिक परमाणु सहयोग संधि का समर्थन किया है। यहां यह सवाल उठता है कि देश में चीन के प्रति अपनी वैचारिक निकटता महसूस करने वाले वामपंथी दलों को क्या इस प्रस्तावित संधि के अपने विरोध के बारे में पुनर्विचार नहीं करना चाहिए? दूसरा, चीन ने भारत को एक परमाणु शक्ित संपन्न देश माना है। चीन एनएसजी का एक प्रमुख सदस्य है और इस नाते अमेरिका के साथ एटमी करार की प्रक्रिया आगे बढ़ने पर भारत को उसके समर्थन की जरूरत पड़ेगी। आशा की जानी चाहिए कि चीन एनएसजी में भारत का साथ देगा। दोनों देशों ने 2010 तक द्विपक्षीय व्यापार 60 अरब डालर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। यह साझीदारी दोनों के लिए लाभदायक है और अन्य मामलों में भी घनिष्ठ सहयोग का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।ड्ढr संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता पाने के लिए भारत लंबे अरसे से दावेदारी करता रहा है, पर चीन ने अपना दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं किया था। यात्रा के दौरान चीन ने कहा कि वह सुरक्षा परिषद सहित संयुक्त राष्ट्र में भूमिका निभाने की आकांक्षा का समर्थन करता है। यात्रा के दौरान चीन ने कहा कि वह सुरक्षा परिषद की आकांक्षा का समर्थन करता है।ड्ढr

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  • Web Title: चीन से सहयोग