अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

जीत के उसजज्बे को सलाम

ाीत के उस जज़्बे को सलाम विश्व-कप में भारत की ऐतिहासिक जीत की रात जयंती एक तरह से भारत समेत पूर एशिया की मनोवैज्ञानिक मुक्ित का समारोह है। कपिलदेव की टीम ने 1में विश्व-कप ही नहीं हथियाया, आने वाले सालों में पाकिस्तान और श्रीलंका की टीमों में भी जीत का एक नायाब जज्बा पैदा कर दिया। इसके बाद एशिया के युवा ने क्रिकेट के मैदान में पीछे मुड़ कर नहीं देखा चिरौरी और आतंकभरी नजरों से गोर खिलाड़ियों की ओर नहीं ताका और उसने आत्मविश्वास के डायनामो ने खिलाड़ियों की अगली युवा पीढ़ी की मानसिकता और उनके जीवन की दशा-दिशा एकदम बदल डाली। फिर आया 2007 में क्रिकेट का न्ोया इक्कीसवीं सदी का अवतार : ‘ट्वेंटी-ट्वेंटी’।़ और एक बार फिर भारतीय टीम ने इस नए क्रिकेट के पहले ही टूर्नामेंट में धमाकेदार विजयश्री हासिल की। धन तो 1े बाद इस खेल में बरसना शुरू ही हो चुका था, अब तो बाकायदा झड़ी लग गई। देखते देखते इंग्लैण्ड-आस्ट्रेलिया और विंडीा के खिलाड़ियों का आतंक और दबदबा मिट चला, और गला फाड़ कर युवा दर्शकों ने टीम से कहा : ‘चक दे इंडिया।’ड्ढr आज जब क्रिकेट पूर देश का चहेता खेल और एक भारी कमाई देने वाला व्यवसाय बन गया है समारोह की घड़ियों में तनिक रुक कर दो-तीन बातों पर गौर करना अच्छा होगा। पहली तो यह, कि आज क्रिकेट में पैसा भले ही भरपूर आ गया हो, लेकिन सिर्फ पैसे से ही जीत का जज्बा नहीं बनता। आज पहली ही बार जीतने वाले नए खिलाड़ी तुरंत करोड़पति बन रहे हैं। पर कपिलदेव की टीम की जीत की घड़ी में बोर्ड-प्रमुख एन.के.पी.साल्वे पुरस्कार के लिए बमुश्किल एक लाख जुटाने की बात कह रहे थे। इससे उस जीत का महत्व और उस बोर्ड तथा टीम का गौरव कम तो नहीं हुआ। इसलिए सिर्फ पैसे की तराजू पर खेल को तौलना सही नहीं है।ड्ढr दूसरी बात यह, कि क्रिकेट के चरमोत्कर्ष के इन जनूनी क्षणों में खेल-प्रशासकों तथा खेलप्रेमियों को अब भारत के राष्ट्रीय खेल हॉकी समेत अन्य खेलों की दशा सुधारने के लिए भी प्रयत्नशील होना होगा। अभी हाल में भारतीय महिला हॉकी टीम एयरपोर्ट से लखनऊ पहुॅंची तो आटो-रिक्शा में लद फॅंद कर।़ एक बस तक उसे मयस्सर न हो पाई। पुरुष हॉकी टीम को भी विजय के लिए सतत राष्ट्रीय पीठ-थपथपाई और जनता द्वारा हौसला-अफााई की दरकार रही है। खेलों के संदर्भ में यह भी गौरतलब है, कि हमार खेल-स्टेडियम, प्रशिक्षण व्यवस्था और चोटिल तथा वयोवृद्ध खिलाड़ियों की समुचित देखभाल व्यवस्था के हाल भी बहुत अच्छे नहीं। उम्मीद है, विश्व कप विजय के रात-ायंती वर्ष में खेलों और खिलाड़ियों पर समग्रता से ध्यान फोकस होगा और स्वस्थ पहल देखने को मिलेगी। दुनिया के सबसे युवा देश को एक सार्थक महाशक्ित बनाने लायक दिल-ािगर और दिमाग तभी मिल पाएंगे जब हमार यहॉं के दर्शक और खिलाड़ी सब सिर्फ और सिर्फ पैसे और क्रिकेट से थोड़ा और आगे बढ़ कर, टीम स्पिरिटड्ढr और स्पोर्ट्समैनशिप जसे स्वस्थ सिद्धांतों को भी अंगीकार करंगे।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: जीत के उसजज्बे को सलाम