DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

एक पत्रकार, जो दोस्त भी था

अस्सी और नब्बे के दशक में रिपोर्टिग करने वाले मेर जसे लोग राजनैतिक बातचीत के लिए निखिल चक्रवर्ती और मधु लिमये के पास जाया करते थे। दोनों के दरवाजे हमार लिए खुले रहते थे, और राजनैतिक घटनाक्रम पर बातचीत के लिए हम बिना किसी एप्वांइटमेंट के शाम को वहां धमक पड़ते थे। वहां हम राजनैतिक चालों को समझने की कोशिश करते थे। वहां रायसीना हिल की घटनाओं पर एक नई अंतरदृष्टि तो मिलती ही थी साथ ही यह तचीत बौद्धिक रूप से समृद्ध करने वाली होती थी।ड्ढr एक बात तय होती थी कि शाम पांच बजे के बाद निखिल चक्रवर्ती 35, काका नगर के फ्लैट में मिलेंगे ही। यहां वे कई बरस से रह रहे थे। आराम कुर्सी में बैठे, अखबार पढ़ते हुए, वहां पहुंचने पर वे चाय के लिए जरूर पूछते थे। बरसात हो रही हो तो पकौड़ियां बनाने के लिए कहते थे। मैं नब्बे के दशक की शुरुआत में निखिल दा से तब मिली जब पी. वी. नरसिंह राव की सरकार थी। मैं कांग्रेस पार्टी और प्रधानमंत्री कार्यालय को कवर करती थी। और नरसिंह राव की चाल को समझने के लिए यह सबसे अच्छी जगह थी। पत्रकार नरसिंह राव को मौनी बाबा कहते थे और वे अंतरविरोधों को निपटाने में काफी माहिर थे। निखिल दा उन्हें अच्छी तरह जानते थे। दोनों दोस्त रह चुके थे। जब राव प्रधानमंत्री थे दोनों की बात घंटे दो घंटे तक चलती थी।ड्ढr दोनों के दोस्त जानते हैं कि आपातकाल के दौरान राव निखिल दा की पत्रिका मेनस्ट्रीम में आपातकाल के विरुद्ध छद्म नाम से लिखा करते थे। निखिल दा ने इस पत्रिका को 1में शुरू किया था और राजनैतिक व सामाजिक मुद्दों की बहस के मंच में बदल दिया था। निखिल दा घटनाओं के सामने आने से पहले ही उसकी गंध पा लेते थ्ेा। सत्ता के गलियार में कौन आ रहा है कौन जा रहा है इसकी दिलचस्प जानकारियां भी उनके पास रहती थीं। मसलन उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे राजेश पायलट के बारे में जानकारी रखनी चाहिए। पायलट को राव पसंद करते थे और उन्हें गृहराज्यमंत्री बनाना चाहते थे ताकि गृहमंत्री एस. बी. चव्हाण के मुकाबले किसी को खड़ा किया जा सके। बावजूद इसके कि चव्हाण राव के बचपन के दोस्त थे। निखिल दा को तमाम तरह के विषयों की जानकारी थी। वे अर्थव्यवस्था के खुालने की वजह से पैदा हुई समस्याओं को भी समझते थे, पर्यावरण को हो रहे नुकसान को भी, देश के विभिन्न हिस्सों में नागरिक अधिकारों की स्थिति को भी और भारत-पाक संबंधों के सभी पहलुओं को भी। लेकिन वे बहुत अच्छे श्रोता थे, उनका लेखन काफी स्पष्ट था और वे खुद को एक रिपोर्टर कहना पसंद करते थे। एक बार मैं राव मंत्रिमंडल के मंत्री के पास गई तो वहां निखिल दा मौजूद थे। नरसिंह राव अमेरिका की यात्रा से लौटे थ्ेा और मै यह जानने के लिए बेताब थी कि उनकी बिल क्िलंटन से क्या बात हुई। बाहर निकलने पर निखिल दा ने मुझे आराम से समझाया कि किसी से जानकारी हासिल करते समय अगर मैं बीच-बीच में टोकना बंद कर दूं तो ज्यादा जानकारी हासिल हो सकती है। निखिल दा के पास नौजवान पत्रकारों के लिए पर्याप्त समय होता था और वे उन्हें प्रोत्साहित भी करते थे। जब आउटलुक पत्रिका शुरू हुई तो उसके पहले ही अंक में नरसिंह राव के उपन्यास ‘इनसाइडर’ के विवादास्पद अंश थे। राव ने उपन्यास की पांडुलिपी निखिल दा को उनकी राय जानने के लिए दी थी। जहां से वह सागरिका घोष के हाथ लग गई और उन्होंने उसे रोमांटिक मोड़ दे दिया। राव को यह लगा कि निखिल दा ने ही इसे लीक किया है। मुमकिन है कि निखिल दा ने यह काम नेक इरादे से किया हो, क्योंकि इसे एक दिन तो छपना ही था। हालांकि दोनों के संबंध इसके बाद भी जारी रहे। राव अक्सर कहा करते थे, ‘एक दोस्त पत्रकार हो सकता है लेकिन एक पत्रकार दोस्त नहीं हो सकता।’ राव उनके दोस्त थे लेकिन निखिल दा ने अपने लेखन में उन्हें कभी नहीं बख्शा। उन्हें जानने वाले राव के सहयोगी उनसे ऐसा न करने का अनुरोध करते थे- ‘आप उनके साथ कई घंटे तक रहते हैं आप अपनी आलोचना निजी तौर पर भी उन तक पहुंचा सकते हैं।’ लेकिन निखिल दा का जवाब होता था ‘उन्होंने अपना स्टैँड सार्वजनिक तौर पर लिया है और एक पत्रकार के रूप में मैं उसकी सार्वजनिक आलोचना ही करूंगा।’ निखिल दा को कोई साम्यवादी कहता था, कोई समाजवादी, कोई इतिहासकार, कोई लेखक, कोई अध्यापक और कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता। लेकिन वे सबसे पहले पत्रकार थे, उन्हें किसी और खाके से देखा भी नहीं जा सकता। ताजा हालात पर अपनी टिप्पणियों और आलोचना में वे निडर दिखाई देते थे। इसमें आलोचना उन लोगों की भी होती थी जिनसे उनके अच्छे संबंध होते थे। वे उस आलोचना को स्वीकार करते थ्ेा। वे जानते थे कि इसके पीछे निखिल दा के कोई निजी आग्रह नहीं हैं।ड्ढr इमरोंसी के दौरान उन्होंने जिस तरह से झुकने के इंकार कर दिया उससे वे कई लोगों के आदर्श बन गए थे। जब उनके संपादकीय सेंसर किए गए तो उन्होंने पेज सादा छोड़ दिया। और जब इसकी क्षाजत भी नहीं मिली तो उन्होंने कुछ समय के लिए मेनस्ट्रीम का प्रकाशन स्थगित कर दिया। नरसिंह राव ने उन्हें राज्यसभा की सीट देनी चाही पर उन्होंने मना कर दिया। अगर वे चाहते तो इसके बहुत पहले ही राजनीति में आ चुके होते। उनकी पत्नी रनू रॉय तो 1में ही सांसद बन गई थीं। उनके लिए पद्मा पुरस्कारों की घोषणा दो दिन तक रुकी रही। वे विदेश में थे और उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा था। और संपर्क हुआ तो उन्होंने मना कर दिया। वे मानते थे कि अगर पत्रकार को निष्पक्ष रहना है तो उसे सत्ता पक्ष से जुड़कर नहीं रहना चाहिए। वे उस पीढ़ी के पत्रकार थे जिन्होंने पत्रकारिता का इस्तेमाल न तो राजनीति में जाने के लिए किया और न ही पैसा बनाने के लिए। और न ही इससे अपनी पत्रिका के व्यावसायिक हितों को साधा। मेनस्ट्रीम को वे बहुत थोड़े से ही बजट से निकालते थ्ेा। सिर्फ उन्हीं विज्ञापनों के भरोसे जो उन्हें उनके चाहने वालों से मिल जाते थे। उनके निधन के बाद के दस साल में मीडिया का नजारा नाटकीय रूप से काफी बदला है। सरकार और बाजार की ताकतों ने जो जटिल चुनौतियां हमार सामने पेश की हैं, उनमें हमें निखिल दा की जरूरत सबसे ज्यादा महसूस होती है।ड्ढr ं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: एक पत्रकार, जो दोस्त भी था