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समाज : उम्मीद के दीपक और दमन का तूफान

पारदर्शिता लाकर भ्रष्टाचार ख़त्म करने के लिए समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं पर चौतरफा हमले हो रहे हैं। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने जनता को दो बड़े तोहफे दिए- राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना तथा सूचना का अधिकार। आज इन दोनों अधिकारों को शासन एवं माफिया द्वारा कुचलन की भरपूर कोशिश की जा रही है और इन अधिकारों के लिए लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं की जानें जोखिम में हैं। झारखण्ड के पलामू जिले में सामाजिक कार्यकर्ता ललित कुमार मेहता की निर्मम हत्या कर दी गई। वह स्वयंसेवी सगंठन ‘विकास सहयोग केंद्र’ के सक्रिय सदस्य थे और भोजन का अधिकार व ग्राम स्वराज अभियान का संचालन कर रहे थे। वह पलामू जिल के छतरपुर और चैनपुर प्रखंडों में राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के सामाजिक अंकेक्षण में दिल्ली से आय कुछ स्वयं सेवकों की सहायता कर रहे थे। इसी प्रकार सूचना का अधिकार कानून के तहत किस तरह सरकारी विभागों द्वारा सूचनाएं दबाई जा रही हैं या ग़लत सूचनाएं दी जा रही हैं इसका कड़वा अनुभव सामान्यत: उन सभी को मिल गया होगा जो सरकारी निर्णयों के बारे में विस्तृत विवरण प्राप्त करना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश के उन्नाव जि़ले के मियागंज प्रखंड में आशा परिवार के कार्यकर्ताओं ने इस कानून के तहत मस्टर रॉल तथा माप पुस्तिकाओं के बारे में सूचना प्राप्त करनी चाही। यशवंत राव ने 4 दिसंबर 2006 को प्रखंड कार्यालय में इसके लिए आवेदन किया। उन्हें 6 महीने बाद जून 2007 में जवाब मिला जिसमें उन्हें 1,58,400 रुपए जमा करन को कहा गया। यह मनमाने ढंग से तय किये दर के आधार पर था जिसमें 2400 रुपये प्रति ग्राम पंचायत की दर से सभी 66 पंचायतों के बारे में सूचना देन के लिए यह रकम मांगी गई थी। कई जगहों से सूचना कार्यकर्ताओं को डराने तथा नकली मुकदमों में फंसान की खबरें आ रही हैं। मणिपुर में 27 वर्षीय सपम कांगलीपाल मेती को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि वह एक सार्वजनिक मंच से नागरिकों को हथियार देन के सरकार के निर्णय पर बहस कर रहे थे। मणिपुर सरकार ने राज्य के दो गाँवों के निवासियों को 500 बंदूकों के लाइसेंस देन का फैसला किया क्योंकि राज्य का एक सशस्त्र गुट, पीपुल रिवॉल्यूशनरी पार्टी ऑफ कांगलीपाक, न कथित रूप से दो लड़कियों तथा एक लड़के की गत 24 मार्च को हत्या कर दी थी। सपम का अपराध यह था कि इस निर्णय पर उन्होंने सार्वजनिक बहस की और उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया। छत्तीसगढ़ में डॉ़ विनायक सेन की गिरफ्तारी को एक साल से ऊपर हो गया। उन्हें छतीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम 2005 और अवैध गतिविधियां (निरोधक) कानून, 1े तहत गिरफ्तार किया गया। वह राज्य सरकार द्वारा नक्सलियों के विरुद्ध चलाये जाने वाले अभियान, सलवा जुडूम, का विरोध कर रहे थे। अगस्त 2007 में एक महिला कार्यकर्ता रोमा को उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अन्तर्गत हिरासत में लिया गया। वह मिर्जापुर में महिलाओं, आदिवासियों एवं दलितों के बीच जंगलों पर उनके अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही थीं। युवा उड़िया कवि तथा साहित्यिक सम्पादक सरोज मोहंती को जुलाई 2007 में गिरफ्तार किया गया। वह प्राकृतिक सुरक्षा सम्पदा परिषद के कार्यकर्ता हैं जिसन काशीपुर में बॉक्साइट खनन कम्पनियों को आने से सफलतापूर्वक रोका है। फेहारिश्त लम्बी है। ये घटनाएं प्रमाणित करती हैं कि आज भी आम लोगों के हित के लिए लड़ने वाले प्रतिब सामाजिक कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है, परंतु हमारी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था उन्हें बर्दाश्त करन को तैयार नहीं है। लोकतंत्र की पहली शर्त है असहमत होन का अधिकार। आज उस अधिकार का गला घोंटा जा रहा है। इसमें सरकार तथा माफिया मिले हुए हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार का लाभ सरकारी अधिकारी, मंत्री तथा अपराधी मिलकर बांटते हैं। ललित मेहता की हत्या इसलिए हुई, क्योंकि राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना में ठेकेदारों के लिए कोई जगह नहीं है और यह उन्हें स्वीकार्य नहीं है। यह खुशी की बात है इस तरह के दमनकारी एवं कुत्सित प्रयासों के बावजूद सामाजिक कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा नहीं है। ललित मेहता की हत्या से अन्य कार्यकर्ताओं का इरादा और मजबूत हुआ और उन्होंने इस लड़ाई को आगे बढा़ने का संकल्प लिया। अन्य को डरान के अपने प्रयत्न में हत्यारे असफल रहे। इसी प्रकार मियागंज में उन कार्यकर्ताओं ने अपना संघर्ष न छोड॥कर राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया। वहां भी लम्बे संघर्ष और 10 सुनवाइयों के बाद अंतत: उन्हें 6 अप्रैल 2008 को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजग़ार गारंटी योजना के बारे में विस्तृत सूचना प्राप्त हुई। दुर्भाग्य से आज भी शासकीय तंत्र बदलते परिवेश को पहचानने से इंकार करते हुए सूचना देने में आनाकानी कर रहा है।ड्ढr

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