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नक्सलवाद: यूपी में चुनावी हिंसा का खतरा नहीं

आगामी लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए नक्सली गतिविधियों पर काबू पान के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश के सूदूर दक्षिणांचल में कैमूर क्षेत्र के जिले सोनभद्र में अभी हाल ही में पांच राज्यों के पुलिस महानिदेशकों की बैठक हुई। झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश के आला पुलिस अफसरों ने नक्सलियों पर काबू पान के लिये संयुक्त रणनीति बनान के मकसद से यह बैठक की। आए दिन अखबारों की सुíखयों में यह छाया रहता है कि आम चुनावों के दौरान नक्सली कैमूर क्षेत्र में किसी बड़ी घटना को अंजाम देने वाले हैं। इन्हीं सुर्खियों के आधार पर पुलिस की गाड़ियों की कॉम्बिंग, थानों का आधुनिकीकरण, करोड़ों रुपय के बजट की बयार इन इलाकों में बहने लगती है। लकिन क्या वास्तविकता यहीं है? हालांकि उत्तर प्रदेश में अभी तक कम स कम पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव के दौरान नक्सलियों द्वारा किसी भी बड़ी घटना को अंजाम देन का मामला सामने नहीं आया है। इस इलाके की भूमि और वनों के विशिष्ट विवाद व आदिवासी और अन्य वंचित समुदायों के विकास को आज़ादी के बाद नज़रअंदाज किया गया। 2001 में राजनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने पहली बार ‘एक के बदले चार मारन का ऐलान करके नफ़रत का बीज बोन का काम किया। यह ऐलान नक्सलियों द्वारा की गई एक वारदात के जवाब में था। इस से पुलिस को जैसे लाइसेंस मिल गया और इस लाइसेंस के मिलते ही पुलिस द्वारा उत्तर प्रदेश में नरसंहार की सबसे पहली घटना मिर्जापुर के भवानीपुर में 16 लोगों को घेर कर मारन की रूप में अंजाम दी गयी। जिसमें 8वीं कक्षा में पढ़ने वाला र्निदोष कल्लू भी था। यही वजह रही कि सन् 2004 के लोकसभा चुनाव व 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को कैमूर क्षेत्र में नकार दिया गया। सोनभद्र की पुलिस द्वारा लगातार यह प्रचार किया जा रहा है कि इस बार चुनाव के दौरान नक्सली किसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकते हैं। इस तथ्य में कितनी सच्चाई है, इसका आकलन करन के लिये समाचार पत्रों से प्राप्त अगर आंकड़ों को देखा जाये तो सोनभद्र में सन् 2004 में जहां 18 नक्सली गिरफ्तार हुये तो 2007 में केवल 7 ही नक्सली गिरफ्तार हुये। जबकि 2005 में मुलायम सिंह के शासन काल में सबसे ज्यादा 55 नक्सली गिरफ्तार हुए। जिनमें 4 महिला व 2 बाल नक्सली भी शामिल थे। सन् 2004 में चुनाव के दौरान केवल अप्रैल माह में कृष्णा यादव व मई माह में सुरेश की गिरफ्तारी हुई जिनका चुनाव स कोई लेना-देना नहीं था। बाकी गिरफ्तारियां या तो चुनाव के बहुत बाद हुई या फिर चुनाव के पहले जनवरी और फरवरी माह में। इसी तरह विधानसभा चुनाव 2007 के दौरान मई माह में केवल एक गिरफ्तारी गोरख यादव की हुई व बाकी चार गिरफ्तारियां जनवरी व फरवरी माह में, एक गिरफ्तारी जून में व एक नवम्बर में की गई। इन सभी गिरफ्तार नक्सलियों पर पोटा के आरोप को मायावती सरकार ने वापस ले लिया व दर्जनों को 2007-08 में जिला न्यायालय द्वारा दोषमुक्त भी करार दे दिया गया है। इसके बाद नक्सलियों द्वारा की गई हत्याओं का अगर ब्यौरा देखें तो पायेंगे कि सन् 2004 में सबसे ज्यादा नक्सलियों द्वारा हत्याएं की गई, जिनकी संख्या 20 थी, परन्तु इनमें स कोई भी हत्या चुनाव से पहले या चुनाव के दौरान नहीं की गई थी। जनवरी 2004 में नक्सलियों ने पुलिस के दो मुखबिरों की हत्या की। इसके अलावा इसी साल के माह नवम्बर 2004 में जिला चन्दौली, नौगढ़ में विस्फोट से 17 पुलिस कर्मियों की हत्या हुई। बाकि दो हत्याएं उनके अपने साथियों की व दो हत्याएं माह दिसम्बर में आम आदमी की हुई। विधान सभा चुनाव 2007 में नक्सलियों द्वारा की गई किसी हत्या का मामला सामने नहीं आया। सन् 2005 में नक्सलयों ने अपने दो साथियों, 2006 में एक पुलिस मुखबिर समेत तीन की हत्या की। सोनभद्र में अब अगर पुलिस मुठभेड़ में मारे गये नक्सलियों का ब्यौरा लें तो 2004 के आम चुनाव व 2007 के विधान सभा चुनाव के दौरान एक भी नक्सली पुलिस मुठभेड़ में नहीं मारा गया। जबकि यह सभी हत्यायें 2001 में 6, 2002 में 5, 2003 में 3, 2005 में 4, 2006 में 2, और 2008 में एक थी। पुलिस द्वारा मुठभेड़ में कुल 23 जानें ली गई। इनमें कई ऐसी मुठभेड़े हैं, जिन्हें फर्जी करार दिया जा चुका है। रनटोला मामले में तो चार दरोगा समेत 16 पुलिसकर्मियों को सीबीआई द्वारा एफआईआर दर्ज कर जेल भी भेज दिया गया था। जिसमें से तीन दरोगा अभी तक फरार हैं। जनपद मिर्जापुर व चन्दौली में भी 2004 के आम चुनाव के दौरान पुलिस मुठभेड़ में किसी नक्सली के मारे जान का मामला सामने नहीं आया। लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं

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