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चांगल में ही मंगल मनायेंगे हाथी

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय का प्रयोग अगर कारगर रहा तो जंगली हाथियों के आबादी वाले इलाके में पहुंचकर तबाही मचाने का सिलसिला रुक सकता है। विवि के कॉलेज ऑफ बायोटेक्नोलॉजी ने बांस की टिशू कल्चर विकसित की है। जंगली हाथी इसे बड़े चाव से खाते हैं। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर जंगल में हाथियों को पर्याप्त मात्रा में यह पौधा मिले, तो वे जंगल की सरहदों से निकलकर गांवों की ओर रुख नहीं करंगे। फिलहाल इसके करीब दस लाख पौधे तैयार की योजना है।विकसित टिशू का नाम ‘टेडरो कैलेमस एस्पर’ रखा गया है। विश्वविद्यालय के एसोसिएट डीन डॉ जेडए हैदर के मुताबिक यह पतला होता है। इसे हाथी बड़े मजे से खाते हैं। जंगल कम होने और भोजन नहीं मिलने से परशान हाथी आबादी वाले इलाकों की तरफ आ रहे हैं। अगर यह टिशू व्यापक पैमाने पर जंगलों में लगा दिया जाये, तो समस्या काफी हद तक दूर हो जायेगी। विवि ने धनबाद और दारीसाई में टिशू कल्चर लैब स्थापित किया है। यहां भी इसका उत्पादन होगा। कॉलेज के वैज्ञानिकों ने केला और मेडिसिनल प्लांट का टिशू कल्चर भी विकसित किया है। केला में मरतमान, जी-मालभोग, रोबस्टा और बेहुला वेराइटी विकसित की गयी है। मरतमान और मालभोग सुगंधित किस्म है। इसकी छीमी लंबी और छिलका पतला होता है। मेडिसीनल प्लांट में धृतकुमारी का कल्चर विकसित कियाड्ढr गया है।ड्ढr

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