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धौंस और धमकी

ाब राजनीति को कुछ लोगों के लाभार्थ बहुत से व्यक्ितयों का उन्माद बना दिया जाए और धर्म परलोक की सुन्दर कल्पना कर वर्तमान जिम्मेदारियों से बचने लगे तब समाज में विग्रह और अराजकता के बीज पनपने लगते हैं। कुछ दिन पहले गुर्जर आरक्षण की राजनीति ने रल यातायात को निशाना बनाया था और अब डेरा सच्चा सौदा के खिलाफ अकालियों के जत्थे यही तरीका अपना रहे हैं। राजनीतिज्ञों और धार्मिक अखाड़ों की इस जंग में आम आदमी पिस रहा है, सार्वजनिक सम्पत्ति को क्षति पहुंच रही है तथा सामाजिक विश्वास को कमजोर किया जा रहा है। यह सही है कि राजनीति साधुओं के लिए नहीं होती, किन्तु इसे असाधु-तत्वों के हाथ का हथियार भी तो नहीं बनने दिया जा सकता। डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख बाबा गुरमीत राम रहीम पहले ही अनेक आरोपों से घिर हैं, मुंबई में उनके अंगरक्षक के हाथों एक सिख की मौत के बाद तो मामला और बिगड़ गया है। पर सहा सवाल बनता है कि जब देश में अपराधियों से निपटने की जिम्मेदारी पुलिस की है तो इसके लिए रल रोको आंदोलन की क्या आवश्यकता है? गुर्जर आरक्षण के समर्थकों की सफलता के बाद कुछ लोगों को लगने लगा कि घी केवल टेढ़ी उंगली से ही निकलता है। इस धारणा को बल देने के लिए काफी हद तक सरकार और शासन भी जिम्मेदार है। जब तर्क के मुकाबले अराजक भीड़ को तराीह दी जाने लगे तब समझदारी की स्थिति नक्कारखाने में तूती जसी बन जाती है। राजनीतिज्ञ अगले चुनाव तथा राजनेता अगली पीढ़ी के बार में सोचते हैं और दुर्भाग्य से आज देश में राजनीतिज्ञों की भरमार व राजनेताओं का अकाल है।ड्ढr वैज्ञानिक युग में विश्वास रखने वालों की समझ में यह बात नहीं आती कि अचानक पिछले दो दशक में देश में धार्मिक उन्माद क्यों बढ़ता जा रहा है? रातों-रात अवैध कब्जों द्वारा हथियायी जमीन पर मंदिर, मसिद, गिरााघर और गुरुद्वार कैसे उग आते हैं। क्यों धार्मिक यात्राओं और जुलूसों के लिए यातायात ही नहीं राष्ट्रीय राजमार्ग तक ठप कर दिए जाते हैं। समस्या का समाधान सोचना और खोजना तो जनता को ही पड़ेगा। बार-बार सड़क रुकने, रल यातायात ठप होने से आजिज आ चुके लोग देर-सबेर जब अपनी परशानी का मूल कारण खोजेंगे तब असली अपराधियों के लिए मुंह छिपाना मुश्किल हो जाएगा।ड्ढr

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  • Web Title: धौंस और धमकी