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अपराधी की सराहना

देश की लंबी न्यायिक प्रक्रिया राजनीति और अपराध को सर छुपाने, मुंह चुराने और अपनी तमाम करतूतों को जायज ठहराने के बहुत से बहाने देती है। बिहार की फास्ट ट्रैक अदालतों ने इन्हीं बहानों पर कुछ हद तक अंकुश लगा दिया है। जिन बाहुबलियों से कभी पूरा बिहार कांपता था आज उसमें ज्यादातर या तो जेल में मुकदमों को झेल रहे हैं या फिर अदालती फैसले के बाद बाकायदा सजायाफ्ता का दर्जा पा चुके हैं। सांसद सूराभान भी इसी श्रंखला की एक कड़ी हैं जिन्हें बेगूसराय की फास्ट ट्रैक अदालत ने बुधवार को उम्रकैद की सजा सुनाई। लेकिन जनता के बीच इस फैसले के स्वागत से बड़ी खबर तब बन गई जब कुछ प्रशंसकों ने सूराभान को महान समाजसेवी का दर्जा दे डाला। कानून कहता है कि जब तक अदालत किसी को दोषी न सिद्ध कर दे उसे निर्दोष माना जाना चाहिए। कानून की इसी अवधारणा का फायदा उठाते हुए हमार राजनैतिक दल बाहुबलियों को न सिर्फ टिकट देते रहे हैं, बल्कि मंत्री तक बना देते हैं। लेकिन यहां तो अदालत द्वारा दोषी करार दिए जाने के बाद भी अपराधी की महानता को सराहा जा रहा है। यही लोग कभी मौका पड़ने पर राजनीति के अपराधीकरण पर चिंता प्रकट करते भी दिख जाएंगे। सूराभान जसों की महिमा मंडन के दो ही अर्थ हैं- या तो वे नेताओं को अपने इशार पर नचा रहे हैं, या सत्ता हासिल करने के लिए राजनीति में एक आजमूदा संबल बाहुबली ही बचे हैं। क्या बाहुबल और अपराध के सामने समर्पण करने वाली राजनीति अब भी इससे मुक्त नहीं होना चाहती? अपराध जगत से बने गठाोड़ से मुक्त होने की यह अनिच्छा ही है जिसने समय-समय पर चुनाव आयोग से लेकर कई दूसरी संस्थाओं की कोशिशों को हमेशा बेमतलब बनाया है। फिलहाल सरकार से तो यह उम्मीद की ही जानी चाहिए कि वह मंत्रियों के लिए एक ऐसी आचरण संहिता बनाएगी जिससे कम से कम किसी सजायाफ्ता का महिमा मंडन तो न हो सके। कोई सत्ताधारी जब किसी अपराधी की तारीफ करता है तो क्या जनता के बीच संदेश यही नहीं जाता कि सरकार भी उसको काबिले तारीफ मानती है?ड्ढr

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