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दक्षिण भारत : गठबंधनों के अवसरवाद का मौसम

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि के लिए जून का महीना खराब रहा जब दो महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनकी रणनीति विफल रही। इनमें से एक मुद्दा राज्य की राजनीति से जुड़ा है जबकि दूसरा राष्ट्रीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। गत लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु से संप्रग की 3सीटों पर विजय में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लगता है कि डीएमके अध्यक्ष विवादास्पद परमाणु समझौते पर स्थिति को ठीक से समझ नहीं पाए। करुणानिधि को भरोसा था कि गत वर्ष की तरह इस बार भी वह कांग्रेस और वामदलों के बीच सिद्धहस्त वार्ताकार की भूमिका निभा पाएंगे, किन्तु इस बार वह स्थिति के आकलन में विफल रहे। बातचीत के मुद्दे तो वही थे, लेकिन अमेरिका और भारत में आसन्न चुनावों से दोनों पक्ष अपने रुख पर ज्यादा अड़ियल हो गए। तमिलनाडु में डीएमके नेतृत्व में सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव एलाइंस (डीपीए) को पिछले सप्ताह तब पहला झटका लगा जब सात पार्टी के गठाोड़ से पीएमके बाहर हो गई। एक नेता के रूप में करुणानिधि की यह विफलता थी। जो मुद्दा इस वर्ष जनवरी से डीएमके-पीएमके के बीच फांस बना हुआ था, वह अनसुलझा रहा और डीपीए की टूट का कारण बना। राष्ट्रीय की बजाए पहले राज्यस्तरीय मुद्दा लेते हैं। यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि डीपीए के सभी घटक दल तमिलनाडु सरकार में जगह न दिए जाने के कारण डीएमके से और खासकर करुणानिधि से नाखुश हैं। 2006 में सबने मिलकर तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी एआईएडीएमके के खिलाफ विधानसभा का चुनाव इस उम्मीद पर लड़ा था कि डीएमके के नेतृत्व में राज्य में एक गठबंधन सरकार बनेगी। किन्तु करुणानिधि ने एसा नहीं किया। उन्होंने कहा कि गठबंधन केवल चुनाव लड़ने तक सीमित था। चुनाव जीतने के बाद घटक दलों को डीएमके सरकार को बाहर से समर्थन जारी रखना चाहिए। सत्ता में शामिल न किए जाने से सभी दलों में कड़वाहट आ गई और पीएमके ने तो जब भी अवसर मिला सार्वजनिक रूप से अपनी नाखुशी जाहिर की। पार्टी के संस्थापक सदस्य और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदोस के पिता एस. रामदोस ने डीएमके सरकार के बहुत से नीति संबंधी निर्णयों के विरोध की आदत ही बना ली। मीडिया साक्षात्कार के दौरान एसा करने में रामदोस विशेष खुशी महसूस करते थे। हद तो तब हो गई जब उन्होंने यह घोषणा कर दी कि अपने दो साल के कार्यकाल में सरकार सभी मोर्चो पर विफल रही है और करुणानिधि सरकार जन-विरोधी है। हालांकि दोनों दल एक-दूसर पर वार करते रहे, पर जनवरी 2008 तक किसी पार्टी ने कोई अतिवादी कदम नहीं उठाया। पोंगल के आसपास एक आडियो सीडी जारी की गई जिसमें डीएमके के दो नेताओं को खत्म करने की धमकी तक दी गई थी। इस सीडी में पीएमके के संस्थापक रामदोस का दाहिना हाथ माने जाने वाले जे. गुरु का भाषण था। जिन दो नेताओं को खत्म करने की धमकी दी गई वे हैं केंद्रीय संचार मंत्री ए. राजा और डीएमके विधायक एस. शिवकुमार। ये दोनों उस वनियार समुदाय से हैं जिसमें पीएमके का व्यापक जनाधार है। इस सीडी प्रकरण ने दोनों पार्टियों के बीच कभी खत्म न होने वाली कटुता पैदा कर दी है। दोनों तरफ से आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया और अंत में नाता तोड़ने का निर्णय ले लिया। लगता तो यही है कि इस टूट की जिम्मेदार पीएमके है जो हर चुनाव से पहले नया गठबंधन बनाने की कला में माहिर है। लोकसभा चुनावों में एक वर्ष से भी कम समय शेष है। चुनावी गठबंधन के लिए अब उसकी नजर कांग्रेस और एआईएडीएमके पर है।ड्ढr राष्ट्रीय स्तर पर भी इस बार परमाणु समझौते पर जारी गतिरोध दूर करने में करुणानिधि को सफलता नहीं मिली है। आम चुनाव निकट हैं और वाम दल विचारधारा से जुड़े परमाणु समझौते पर किसी भी सूरत में झुकने को तैयार नहीं हैं। इस बार करुणानिधि की यह लाइन कि संप्रग व वाममोर्चे में फूट का लाभ सांप्रदायिक शक्ितयों को मिलेगा, नहीं चल पाई। वाम दलों ने इसे खारिा कर दिया। क्या विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने वाम दलों को इस लाइन पर समझाने की भरपूर कोशिश नहीं की? राजद प्रमुख और केंद्रीय रल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने भी सहयोगी दलों को जमीनी हकीकत से रूबरू कराने का भरपूर प्रयास किया है। प्रणव व लालू की विफलता के मुकाबले करुणानिाधि की विफलता कहीं उल्लेखनीय है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं से उनकी टेलीफोन पर बात तथा चेन्नई में मुलाकात का काफी प्रचार कियाड्ढr गया था। प्रधानमंत्री के साथ दिल्ली में उनकी संभावित वार्ता का भी जमकर प्रचार किया गया था। मजबूरन करुणानिधि द्वारा अपना दिल्ली दौरा रद्द करना, स्वत: सब कुछ कह जाता है।ड्ढr ं

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