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सिर्फ कागज पर चल रहा गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम

नक्सली समस्या से ग्रस्त झारखंड में सिर्फ कागज पर ही गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। वहीं इस कार्यक्रम से जुड़ीं स्वयंसेवी संस्थाएं भी इस दिशा में कुछ ठोस नहीं कर पा रहीं। इससे सूबे में वास्तविक निर्धनों को चिह्नित करने में कठिनाई आ रही है। वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के अनुसार महा तीन फीसदी लोगों को स्वरोजगार और आवास कार्यक्रम का लाभ मिल रहा है। पारिश्रमिक पर रोजगार संबंधित कार्यक्रमों का लाभ 11 फीसदी लोगों को मिल रहा है।ड्ढr कार्यक्रम मूल्यांकन संगठन द्वारा किये गये सव्रेक्षण के अनुसार गरीबी रखा से नीचे रहनेवाले 50 फीसदी परिवारों को ही लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लाभ मिल रहा है। खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के सव्रेक्षण के अनुसार आधे से अधिक लोग आज भी खाद्यान्न के लिए खुले बाजार पर निर्भर हैं। गरीबी झेल रहे लोगों के उत्थान में अंर्तसरचना और इसकी गुणवत्ता प्रमुख बाधा है। इसका झारखंड में काम करनेवाली कंपनियों-फर्मो को सामना करना पड़ रहा है।ड्ढr सूबे के ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि-वितरण में भी काफी विषमताएं हैं। भू-स्वामित्व के पैमाने पर निचले वर्ग की 43 फीसदी आबादी के पास सिर्फ चार फीसदी जमीन है। विगत दस साल में भू-स्वामित्व का औसत आकार 2.25 एकड़ से घटकर 1.64 एकड़ रह गया है। यह किसी भी मानक से सबसे अधिक गिरावट है। सड़क के मामले में भी झारखंड हाशिये पर है। सिर्फ 36 फीसदी गांवों की पहुंच उन सड़कों तक है, जो साल भर खुली रहती हैं। ं

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