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सियासी कायाकल्प का वर्ष

भारतीय सत्ता और समाज के इतिहास में क्या 2014 को आम आदमी के उभार के वर्ष के रूप में याद किया जाएगा? यह सवाल इस वक्त देश के करोड़ों लोगों के जेहन में गूंज रहा है। इसके उपजने की तीन बड़ी वजहें हैं। पहली, पिछले कुछ वर्षों में लोगों को कई ऐसे हक-हुकूक हासिल हुए हैं, जिनसे वे खुद को सत्ता में हिस्सेदार पाने लगे हैं। सूचना, शिक्षा, खाद्य-सुरक्षा, रोजगार, सेवा आदि के अधिकार इनमें शामिल हैं। दूसरी, तरह-तरह के घोटालों और सत्ता नायकों की मनमर्जी से आजिज आ चुके देश के नौजवानों में परिवर्तन की आकांक्षा जोर मारने लगी है। अन्ना के आंदोलन ने इसे स्वर दिए और अरविंद केजरीवाल की सत्तानशीनी ने बल प्रदान किया। तीसरी, हर राजनीतिक दल में नई पीढ़ी का अभ्युदय। आइए, अब इन तीनों मुद्दों पर विस्तार से बात करें। मुझे अपने बचपन की याद है। हम मिर्जापुर में रहते थे। मेरे पिताजी राजकीय अधिकारी थे। उन दिनों एक-दो दफ्तरों के अलावा कहीं भी दिन में चौकीदार नहीं हुआ करते थे और लोग अपनी बात कहने के लिए अधिकारियों तक आसानी से पहुंच जाते थे। जिन जिलों में उत्साही कलेक्टर होते थे, वहां जन-सुनवाई के साप्ताहिक दौर चला करते थे। मैंने खुद ऐसे जिला मजिस्ट्रेट देखे हैं, जो तहसीलों या गांवों में खेतों के बीच कुरसी डालकर बैठ जाते थे। उस समय कोई भी उनसे मिल सकता था।

1975 के बाद से यह सिलसिला थमने लगा। आपातकाल ने अधिकारियों को निरंकुश बनने का मौका दिया और फिर जैसे यह परंपरा बन गई। 1980 और 90 के दशक में आतंकवाद के प्रसार ने अफसरों को सुरक्षा के नाम पर जनता की अनदेखी का जैसे हक ही प्रदान कर दिया। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि नेता कड़ी सुरक्षा के दायरे में खुद को महफूज पाने लगे थे। जब जनता के नुमाइंदे जन-जन को उपलब्ध होते थे, तो राजकीय अधिकारियों को भय लगता था कि कोई भी उनकी शिकायत कर सकता है। अच्छे दिन थे वे। एक किस्सा सुनाता हूं। यह 1980 के दशक के शुरुआती वर्षों का वाकया है। मैं इलाहाबाद के जॉर्ज टाउन से गुजर रहा था। देखा कि एक बंगले के बाहर पीएसी का ट्रक खड़ा है और क्षेत्रधिकारी स्तर का अधिकारी सुरक्षा इंतजामात पर नजर रखे हुए है। आश्चर्य हुआ। कुछ घंटे पहले जब इधर से निकला था, तब ऐसा कुछ भी नहीं था। जिस बंगले के बाहर सशस्त्र जवान तैनात थे, उसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की नजदीकी रिश्तेदार रहती थीं।

पत्रकारीय जिज्ञासावश मैंने स्कूटर किनारे खड़ा कर पुलिस अफसर से पूछा कि अचानक यह सरंजाम क्यों? उसका जवाब था कि कुछ देर के लिए प्रधानमंत्री यहां आ रही हैं। उन दिनों मोबाइल फोन नहीं हुआ करते थे। टेलीफोन भी बहुत कम लोगों के घरों पर लगे थे, पर पता नहीं कैसे दो और पत्रकार वहां आ गए। इसी बीच श्रीमती गांधी भी आ पहुंचीं। उन दिनों प्रधानमंत्री के लिए न घंटों पहले ट्रैफिक रोका जाता था और न ही दजर्नों गाड़ियों का काफिला उनके साथ चलता था। आज का दौर होता, तो सुरक्षाकर्मी हमें धकियाकर सैकड़ों मीटर दूर खड़ा कर देते, पर वह जमाना और था। हमने वहां तैनात पुलिस अधिकारी से अनुरोध किया कि वह प्रधानमंत्री तक संदेश पहुंचा दें कि इलाहाबाद के पत्रकार उनसे मिलना चाहते हैं। वह कुछ करता, इससे पहले ही श्रीपति मिश्र पोर्टिको में आते दिख गए। मिश्र उन दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। मैंने ऊंची आवाज में कहा कि मिश्र जी कृपया श्रीमती गांधी से कहें कि हम लोग उनसे मिलना चाहते हैं। उन्होंने हाथ हिलाकर आश्वासन दिया और थोड़ी ही देर में हम तीनों प्रधानमंत्री के सामने खड़े थे। क्या आज यह संभव है?

प्रधानमंत्री तो दूर, मुख्यमंत्री और मंत्री तक पहुंच से दूर हो गए हैं। कुछ की तो सुरक्षागत मजबूरियां हैं और बाकी ने इसे अपनी आन-बान-शान का प्रतीक बना लिया है। कब्रों में पैर लटकाए हुए लोगों को जब मैं सुरक्षाकर्मियों से घिरे देखता हूं, तो मन में सवाल उठता है कि भला इनकी जान कौन लेगा? काल खुद इन पर नजर लगाए हुए है, लेकिन जब भी इनकी सुरक्षा हटाने की बात की जाती है, तो विधानमंडलों में हंगामा मच जाता है। पीपल के पत्ते की तरह कांपते या अपने लिए असुरक्षा का स्वांग रचते नेताओं की वजह से हमारे नौकरशाह बेलगाम होते चले गए।
धूर्त अफसरों की समझ में आ गया था कि वे जिसे चाहेंगे, वही सत्ता नायकों तक पहुंच सकता है। जो उनकी कृपा से सत्ता सदन के अंदर पहुंचेगा, वह शिकायत कैसे करेगा? आम आदमी और जन-प्रतिनिधियों के बीच पनपी यह संवादहीनता धीमे-धीमे प्रशासनिक जड़ता को लाइलाज मर्ज में तब्दील करती गई।

यह दुर्भाग्यजनक था, पर हमारे देश की सबसे बड़ी खूबी है कि वह अपनी बलाओं से खुद निपटना जानता है। शिक्षा के प्रसार ने लोगों में पिछले दो दशकों में अभूतपूर्व चेतना जागृत की है। नेताओं और अफसरों के बंद दरवाजों पर इस जनाकांक्षा की थाप की गति इतनी तेज होती गई कि सरकारें इस तरह के कानून बनाने को मजबूर हो गईं, जो प्रभुवर्ग की कारगुजारी को पारदर्शी बनाने लगें। इसने जनता के मन में सत्ता में भागीदारी की नई चेतना विकसित की।
यही वजह है कि प्रभावशाली वर्ग के घोटाले सामने आने लगे और जब सरकारों ने नहीं सुनी, तो लोगों ने उपलब्ध जानकारी की मशाल लेकर अदालतों के दरवाजे खटखटाने शुरू कर दिए। 2-जी, कॉमनवेल्थ, कोयला आवंटन जैसे अरबों रुपये के गोलमाल को नेताओं ने नहीं, बल्कि ऑडिटरों, आम आदमी और अदालतों की संगत ने बेनकाब किया।

आजाद भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब इतनी संख्या में मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों को अपनी कुरसियां गंवानी पड़ीं। तमाम मंत्री और आला अफसर जेल की हवा खाने को मजबूर हुए। इस तरह समरथ कहुं नहिं दोषु गोसाई की सदियों पुरानी उक्ति को इस देश की जनता-जनार्दन ने उल्टे रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर दिया। इसी बीच कई राजनेताओं को उम्र ने आईना दिखाना शुरू कर दिया है। शरद पवार घोषणा कर चुके हैं कि वह लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे। तमाम बड़े नाम ऐसे हैं, जिनके लिए 2014 का चुनाव सक्रियता के लिहाज से आखिरी साबित होगा। ईश्वर करे वे दीर्घायु हों, पर इन सबके खानदानों में नए वारिस आ गए हैं। वंशवाद रहित राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में भी नई पीढ़ी आगे आने लगी है।

मसलन, भाजपा में अटल और आडवाणी का युग समाप्त हो गया है। नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह इस दल के नए सारथी हैं। वामपंथी दल भी इससे अछूते नहीं हैं। नई पीढ़ी के इन सियासी सूरमाओं की आंखों पर पुराना चश्मा नहीं है। वे जानते हैं कि सत्ता के खेल में उनका भाग्य विधाता आंखें खोल चुका आम आदमी है। इसीलए वे अपने वोटर को भरमाने की बजाय ठोस काम पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। पांच राज्यों में पिछले महीने हुए विधानसभा चुनावों ने भी यही साबित किया। यह ट्रेंड नई आशा बंधाता है। कुछ निराशावादियों को दिल्ली अब भी दूर लगेगी, पर यह तय है कि संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र में राजनीति के तन-मन का कायाकल्प शुरू हो गया है। उम्मीद है, अगले आम चुनाव इसे नवयौवन देंगे।

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