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मैं सरकार चलाने के लिए सही इंसान नहीं

हिट फिल्मों की गारंटी माने जाने वाले सलमान खान इन दिनों अपनी नई फिल्म जय हो को लेकर काफी उत्साहित हैं। इस फिल्म में आम आदमी की मुसीबतों की बात की गई है। इसे आम आदमी पार्टी के उदय से भी जोड़कर देखा जा रहा है। यह माना जा रहा है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल इस फिल्म की कामयाबी में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। पिछले दिनों फिल्म के प्रमोशन के दौरान सलमान से बात की शांति स्वरूप त्रिपाठी ने। बातचीत के अंश:

जय हो क्या पूरी तरह से रीमेक है?
जी हां, यह तेलुगू फिल्म स्टालिन का रीमेक है, जिसमें चिरंजीवी जी ने मुख्य भूमिका निभाई थी। मगर जैसा कि हम पहले से करते आए हैं, फिल्म के प्लॉट को लेने के बाद हमने नए सिरे से यह पटकथा लिखी है।

लोग कह रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल की ‘आम आदमी पार्टी’ की कामयाबी के कारण कहानी के केंद्र में आम आदमी को रखा है?
कितनी अजीब बात है। मैं अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए बात करना चाहता हूं, लेकिन मेरा इंटरव्यू पूरी तरह से राजनीतिक हो जाता है। एक वक्त वह था, जब कांग्रेस पार्टी ‘आम आदमी’ की बात करती थी, अब अरविंद केजरीवाल ने ‘आम आदमी‘ को हथिया लिया है। आम आदमी की मुसीबतों को लेकर जब दक्षिण में स्टालिन बनी थी, तब तक तो इस नई पार्टी का जन्म भी नहीं हुआ था। मेरी फिल्म में आम आदमी कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है। आम आदमी एक आम भारतीय  यानी हम सब हैं। 

अरविंद केजरीवाल को लेकर क्या कहेंगे?
लोग हर तरफ से निराश-परेशान हैं। ऐसे वक्त में उनकी समस्याओं का निदान करने का दावा करने वाली एक नई पार्टी उनके सामने आई, तो उन्होंने उसे जिता दिया। अरविंद केजरीवाल ने ईमानदारी की बात कही है। भ्रष्टाचार खत्म करने की बात कही है। मुझे उम्मीद है कि वह बहुत अच्छा काम करेंगे, क्योंकि जिन लोगों ने उन्हें वोट दिया है, वे उम्मीद करते हैं कि वह उनका साथ दें। यदि केजरीवाल ने कुछ अच्छा करके नहीं दिखाया, तो लोगों का हर इंसान पर से यकीन उठ जाएगा। यह नौबत न आए, इसलिए जरूरी है कि अरविंद केजरीवाल ने जो वायदे किए हैं, उसे वह पूरा करें। फिलहाल उन्होंने कुछ अच्छे कदम उठाए हैं, जिससे दिल्ली की जनता का भला हो रहा है। उन्हें इस बात की समझ है कि सरकार को सही तरीके से कैसे चलाया जाए। हो सकता है कि मैं बहुत अच्छा इंसान हूं। मेरी नीयत बहुत अच्छी है। पर यदि मुझे काम करना नहीं आता, सरकार चलाना नहीं आता, तो कुछ नहीं आता। मुझे उम्मीद है कि अरविंद केजरीवाल के पास देश को चलाने की स्किल है। यदि उनके पास स्किल नहीं है, और सिर्फ हवा में बातें कर रहे हैं, तो सब बेकार हो जाएगा। उन्हें किसी एक चीज को नहीं, पूरे राज्य को देखना है। लोगों को उन पर यकीन है। उन्हें लोगों के विश्वास पर खरा उतरना होगा, ताकि लोग कहें कि हमने सही इंसान को चुना है।

खुद आप कभी देश चलाने के बारे में भी सोचते हैं?
दोनों बहुत अलग चीजें हैं। देश चलाने के लिए जमीनी स्तर से शुरुआत करनी पड़ेगी। हर काम करने के लिए शुरुआत तो पैसों से होती है, जो कि हमारे पास नहीं है। यहां वे सारे लोग काम कर रहे हैं, जो किसी न किसी राजनीतिक परिवार में पैदा हुए हैं। कुछ ग्रास-रूट राजनीतिज्ञ हैं। वे सब कुछ जानते हैं। वे ब्यूरोकेट्र्स के जॉब को भी समझते हैं। मैं खुद को सरकार चलाने के लिए सही इंसान नहीं मानता।

इस वक्त देश की जो स्थिति है, उस पर आप क्या कहेंगे?
देश में दो तरह के लोग हैं। एक वे लोग हैं, जो हर तरह से बर्बाद होते हुए भी हमेशा यही कहते हैं कि सब कुछ ठीक है। दूसरे वे हैं, जो हमेशा रोते रहते हैं। हमारा चैरिटेबल ट्रस्ट है ‘बीइंग ह्यूमन।’ शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर लोगों की मदद करता है। हमारा ट्रस्ट ऐसे लड़कों या लड़कियों की पढ़ाई में मदद करता है, जो वास्तव में पढ़ना चाहते हैं। जो अपाहिज हैं, उनकी भी यह मदद करता है। यदि कोई बीमार है, तो हम उनकी मदद करते हैं। पर मेरे पास कुछ लोग घर खरीदने के लिए आर्थिक मदद मांगने आते हैं। तब मुझे गुस्सा आता है। कुछ लोग चाहते हैं कि मैं उन्हें नौकरी दिला दूं। ये सब नई पीढ़ी के लोग हैं, जो काम नहीं करना चाहते।

आपको लगता है कि मल्टीप्लैक्स के आने के बाद सिनेमा में बदलाव आया है?
मल्टीप्लैक्स के आने के बाद सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि अब एक फिल्म एक साथ हजारों स्क्रीन में रिलीज होने लगी है। छोटे बजट की फिल्मों को मल्टीप्लैक्स की वजह से सहारा मिल रहा है। बीच में लग रहा था कि मल्टीप्लैक्स के बाद सिंगल थिएटर का अस्तित्व नहीं रहेगा, पर ऐसा नहीं हुआ। दबंग सिंगल थिएटर और मल्टीप्लैक्स, दोनों स्क्रीन पर चली। शर्त यही है कि फिल्म अच्छी हो।

इन दिनों तो हर कोई ‘सौ करोड़ क्लब’ का हिस्सा बनने के चक्कर में है..?
माफ करना, मैं किसी भी नंबर गेम का हिस्सा नहीं बनना चाहता। पर मैं यह भी नहीं चाहता कि मेरी फिल्में फ्लॉप हों। मैं बाक्स ऑफिस कलेक्शन को लेकर कोई रिकॉर्ड तोड़ने में यकीन नहीं करता। लेकिन मैं अच्छी फिल्म बनाना पसंद करता हूं। मगर सिनेमा के टिकटों के दाम तय करना मेरे या मेरे भाई सोहेल के हाथ में नहीं है।

लोग कहते हैं कि आपको दर्शकों की नब्ज की पहचान है?
मैं हमेशा वैसा सिनेमा करना चाहता हूं, जिसे मैं बचपन से देखता आया हूं। जिस तरह के सिनेमा का मैं शौकीन रहा हूं। फिर चाहे लोग उसे बकवास सिनेमा कहें, सलमान खान सिनेमा कहें या कमर्शियल सिनेमा कहें या कोई और नाम दें। फिल्म का हीरो वही होता है, जब वह परदे पर गिरे, तो दर्शक चिल्लाए कि ‘उठ।’

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