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अबलौं नसानी..

‘अबलौं नसानी, अब न नसैहों
आप-कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं।
आप रूप सुचि रुचिर कसौटी चित कंचनहिं कसैहों!’
(अब तक का जीवन बर्बाद किया। आगे न करूंगा। आप की कृपा की कसौटी पर अपने चित्त को कसूंगा: तुलसी ‘विद सम चेंज’)
हे प्रभो! आप से आ रहा हूं। आप से बातें कर रहा हूं। आप से लड़ रहा हूं। आप से जीत रहा हूं! आप का सीजन है। आप का रीजन है।
आप यूं ही अगर हमसे मिलते रहे
देखिए एक दिन प्यार हो जाएगा!
हो क्या जाएगा? हो चुका है। मेरा दिल आप की आंखों में खो जाएगा नहीं, बल्कि खो चुका है, क्योंकि आप की नजरों ने समझा प्यार के काबिल मुझे। दिल की ऐ धड़कन संभल जा, मिल गई मंजिल मुझे। वह  एयर लाइन वाला आप के दफ्तर की ओर दौड़ रहा है। वह इनफोसिस वाला फॉर्म भर रहा है। वह बैंकर आप की मेंबर बनने जा रही है और वह नामी-दामी कलाकार आप के फॉर्म भरती दिख रही है। उधर देखिए, हमारा परम प्यारा दुलारा पत्रकार लाखों की नौकरी छोड़कर आप के चरणों में नमन कर रहा है। उसकी टोपी पहन रहा है। त्याग हो, तो ऐसा। भाग हो, तो ऐसा।

आप का राष्ट्रीयकरण हो रहा है। बुद्धिजीवी का मन मचल रहा है- मेरी आखों से कोई नींद लिए जाता है। दूर से आप का पैगाम दिए जाता है कि सन चौदह की संसद मेरी मुंतजिर है। मैं खाली-पीली दर्शक बना रहूं। यह अपराध मुझ से अब और न होगा। आप ने एक ‘कवि हृदय’ पाया है। पहली बार आप का दिल गाने पर आया, तो इंसान का इंसान से हो भाई चारा  वाला गीत गाया, तभी से अपना दिल आप पर आया। दिल विल प्यार व्यार मैं क्या जानूं रे/ जानूं तो जानूं बस इतना कि आप को अपना मानूं रे। आपकी अइया हूं। आपकी गइया हूं। आपका भइया हूं। आपका गवइया हूं। आपके पइयां हूं। आपका गुइयां हूं। आपका टुइयां हूं। बाकी कवि क्या हैं? थर्ड रेट हैं और आप के पास एक कवि कॉरपोरेट है। मंच के हैं, लेकिन सौ आना टंच हैं-  एक भरोसो, एक बल, एक आस विश्वास!  क्यों कुमार विश्वास? आप की दिल्ली है। आप की बिल्ली है। बाकी सब चूहा हैं। कैसी तो ऊंहा है? आप का डंडा है। आप का फंडा है।

आप का झंडा है। बाकी बचा अंडा है। आप ही करीम हैं। आप ही रहीम हैं। रहीम जी ने कहा था। अब आप ने किया है:
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून
पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुस, चून।
आप का पानी है। आप की कहानी है। आप का जमाना है। आप की लाइट है, आप की काइट है। आप की फाइट है। आप ही राइट हैं। यह बिजली-समय है। आप ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ हैं। अद्भुत यह लय है। भ्रष्टाचारियों में पसरा भय है। आप के साथ यह लेखक भी निर्भय है। आप का सोशल है। आप का मीडिया है। आप का फेस है। आपकी बुक है। आप की मैना है। आप का शुक है। आप की आशा है। आप की भाषा है। आप का तमाशा है। आप का जलवा है। आप का गलबा है। बाकी सब मलबा है। इसीलिए विनय पत्रिका से सुनाता हूं:
‘अबलौं नसानी, अब न नसैहों।
आप कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं।।’

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