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मूवी रिव्यू: यारियां..

मूवी रिव्यू: यारियां..

एक ही फिल्म के अंदर सारे मसाले डालने की कोशिश का नाम है ‘यारियां’। प्यार-मोहब्बत, अंग प्रदर्शन, लम्बा लिपलॉक किस सीन से लेकर कॉलेज की मस्ती, देशभक्ति और मिशन इम्पॉसिबल। इसके साथ सिक्किम और आस्ट्रेलिया के खूबसूरत लोकेशंस। ऐसा शायद फिल्म की निर्देशक दिव्य खोसला कुमार ने इसलिए किया है, क्योंकि वह अपनी पहली ही निर्देशकीय फिल्म में कोई खतरा नहीं उठाना चाहती थीं। इस फिल्म को देखते हुए एक खतरा जरूर है। वह है कि आपको कोई मेमोरी लोचा हो सकता है और इसका नतीजा यह हो सकता है कि आपका दिमाग चाचा चौधारी की तरह चलने लगे या फिर इस फिल्म की कैरेक्टर सलोनी की तरह हो जाए, जिसे आंकड़े कम्प्यूटर की तरह याद रहते हैं। और अगर ऐसा हो गया तो हो सकता है कि फिल्म देखते वक्त मुन्ना भाई सीरीज का सूत्रधार, फिल्म ‘एबीसीडी’ वाली चोरी, ‘लगान’ वाली गद्दारी और देशभक्ति के साथ ‘जो जीता वही सिकंदर’ की याद आने लगे। वैसे याद और भी कई फिल्में आ सकती है। एक पंक्ति में कही जाए तो कई फिल्मों की कॉकटेल है ‘यारियां’।

फिल्म कैम्पस लाइफ की मस्ती से शुरू होती है। फिल्म का मुख्य किरदार लक्ष्य (हिमांशु कोहली) हमेशा लड़कियों के पीछे भागने वाला इंसान है। उसे और उसके चार साथियों को कॉलेज का प्रिंसिपल अचानक बन आए हालात के मद्देनजर एक मिशन के लिए चुनता है। उन्हें एक ऑस्ट्रेलियाई बिजनेसमैन से स्कूल बचाने का जिम्मा मिलता है। मामला यूं है कि उस बिजनेसमैन ने स्कूल की आधी जमीन खरीद ली है और वह वहां होटल और बार बनाना चाहता है। प्रिसिंपल के अनुरोध पर वह कहता है कि अगर तुम्हारे स्कूल के बच्चे पांच किस्म की प्रतियोगिताओं में आस्ट्रेलियाई टीम से जीत जाएं तो वह स्कूल की जमीन नहीं लेगा।

इन पांच में से चार लड़के-लड़कियां पूरी तरह बिगड़े हुए हैं। एक गंभीर लड़की है सलोनी (रकुल प्रीत सिंह), जिसका दिमाग कम्प्यूटर की तरह आंकड़ों को याद रखता है, लेकिन उसका आत्मविश्वास थोड़ा-सा हिला हुआ है। अब चूंकि पढ़ने-लिखने वाली लड़की है, उस पर से कॉन्फिडेंस भी कम है तो जाहिर है ऐसे कैरेक्टर को दिखाने के लिए बॉलवुडिया फॉर्मूले के तहत उसे एक चश्मा और भरे-पूरे कपड़े पहनने पड़ेंगे, साथ में पीछे खींचकर बाल बांधना पड़ेगा। यहां भी इसी  बॉलीवुडिय फॉर्मूले पर चली हैं निर्देशक। अब चूंकि फिल्में देख-देख कर आज के यंगस्टर्स ऐसी लड़कियों को बहनजी मानते हैं तो निर्देशक को भी वही मानेगी यह तो तय है। इस बहाने फिल्म में पढ़ाई-लिखाई और मूल्यों का भद्दा मजाक उड़ाया है और लापरवाही, उद्दंडता और उच्छृंखलता को कूल बताया गया है।

फिल्म में आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों की हाल-फिलहाल में हुई नस्ली हत्याओं को भी भुनाने की कोशिश की गई है, लेकिन सतही ढंग से। बॉलीवुड की ज्यादातर फिल्मों की तरह इसमें भी दिखाया गया है कि अगर भारतीयों से कोई दूसरा देश प्रतियोगिता करेगा तो वह बिना चीटिंग के जीत ही नहीं सकता है। इसके अलावा अमूमन फिल्मों की तरह इसमें भी यह दिखाया गया है कि बिगड़े हुए युवा सही रास्ते पर तभी आते हैं, जब उन्हें कोई बड़ा सेंटिमेंटल शॉक लगता है। चाहे वह शॉक कॉलेज बचाने के नाम पर लगे, या देशभक्ति,  महबूबा या परिवार आदि के नाम पर लगे। और यह झटका उन्हें इतना मजबूत बना देता है कि वह अकेले पूरी दुनिया से टकरा जाते हैं और उन्हें हरा भी देते हैं।

इसके लिए उन्हें एक दिन के भी अभ्यास की जरूरत नहीं होती। इसके बाद उनके अंदर परम्परा, मूल्य, देश आदि को लेकर जबरदस्त प्यार उमड़ आता है। इस फिल्म में भी कुछ अलग नहीं हुआ। ये युवा पढ़ाई के सिवा सबकुछ करते हैं, जो एक छात्र की प्राथमिकता में अव्वल नंबर पर होनी। फिल्म के अधिकतर गाने चार्ट बस्टर में अपनी जगह बना चुके हैं। पानी-पानी.. और मेरी मां.. का फिल्मांकन भी शानदार है। फिल्म की कमजोरी भी गीत ही हैं, जो फिल्म की कहानी को निर्बाध नहीं बढ़ने देते। फिल्मों के दृश्यों पर पानी की तरह पैसे बहाये गए हैं। गुलशन ग्रोवर और दीप्ति नवल को छोड़ कर फिल्म के सारे कलाकार नये हैं। इन दोनों ने अपनी भूमिका से न्याय किया है। नये कलाकारों ने भी काफी मेहनत की है। सलोनी की भूमिका में रकुल प्रीत सिंह ने जानदार अभिनय किया है। उनकी हाव-भाव और आंखें बोलती हैं। अगर थोड़ी सावधानी बरतें तो उनका भविष्य उज्जवल है। फिल्म के बारे में बस इतना ही कहा जा सकता है कि युवा दर्शकों के दम पर यह ठीक-ठाक बिजनेस कर सकती है।

सितारे: हिमांशु कोहली, रकुल प्रीत सिंह, सेराह सिंह, देव शर्मा, निकोल फारिया, गुलशन ग्रोवर और दीप्ति नवल
निर्देशक: दिव्य खोसला कुमार
निर्माता: भूषण कुमार, कृषण कुमार
कहानी-पटकथा और संवाद: दिव्य खोसला कुमार

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