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करियर ओरिएंटेड नहीं हूं मैं

करियर ओरिएंटेड नहीं हूं मैं

अभिषेक चौबे 2010 में ‘इश्किया’ जैसी शानदार और सफल मूवी देने वाले निर्देशक चार साल बाद इसी सीरीज की अगली फिल्म ‘डेढ़ इश्किया’ लेकर एक बार फिर दर्शकों के सामने हैं।

‘इश्किया’और ‘डेढ़ इश्किया’में चार साल का अंतराल क्यों?
मैं बहुत ज्यादा करियर ओरिएंटेड नहीं हूं। मुझे सफलता भुनाना नहीं आता। ‘इश्किया’के बाद दो स्क्रिप्ट पर काम शुरू किया। दोनों बेहद कॉम्प्लीकेटेड थे। तभी मुझे ‘डेढ़ इश्किया’ का ऑफर मिला, पर मैंने पहले अपनी दोनों स्क्रिप्ट पूरी की। फिर ‘डेढ़ इश्किया’ स्वीकारा।

क्या ‘इश्किया’’की तरह ‘डेढ़ इश्किया’ में भी रिवेंज है?
बिल्कुल नहीं। दोनों कहानी में कोई समानता नहीं है। ‘इश्किया’ तो ऐसी फिल्म थी, जो बहुत ज्यादा पढ़ने वालों को भी समझ में नहीं आएगी। इस बार नयी कहानी है और फ्लेवर भी अलग।

इस फिल्म में आपने बेगम पारा और मुनिया जैसे जो चरित्र गढ़े हैं क्या ऐसे पात्रों को समाज में कहीं देखा है?
जब ‘इश्किया’ के सीक्वल की बात आई, तो मैंने मना कर दिया था, क्योंकि मेरे पास कहानी नहीं थी। इसके बाद विशाल भारद्वाज ने दारा फारूकी से बात की। दारा ने ये दुनिया और पात्र गढ़े हैं। मुझे कहानी रोचक लगी, तब इस पर काम करना शुरू किया। हमारी फिल्म में कविता भी कहानी का एक हिस्सा है। इसमें अवध के नवाबी कल्चर को पेश किया है, लेकिन कहानी 2013 की है। हमने दिखाया है कि कभी नवाब रहे लोग आज के जमाने में किस तरह से रह रहे हैं। यह पूरी दुनिया एक अदब की दुनिया है। इस अदब की दुनिया में अगर हम खालूजान और बब्बन मियां जैसे दो बदमाश पात्रों को लेकर जाते हैं,तो क्या होता है?

नवाबी पर कोई रिसर्च वर्क भी किया? और उसके अनुभव कैसे रहे?
शूटिंग के दौरान मुझे बड़े प्यारे अनुभव हुए। महमूदाबाद के लोगों ने बड़े प्यार से हमारा स्वागत किया। हमें जिस चीज की जरूरत पड़ती, वह मदद करते। हमने पांच सौ से छह सौ लोगों की भीड़ भी इकट्ठी की, उनके लिए हमने कॉस्ट्यूम  भी बनवाए।

ऐसा क्या था, जिससे आपको लगा कि ये फिल्म निर्देशित की जा सकती है?
यह तो कहानी का मुख्य मुद्दा है, जिसे आप फिल्म में देखेंगे।

विद्या बालन को दोबारा कॉस्ट न करने की वजह?
देखिए, विद्या बालन का जो कृष्णा का किरदार था, वह ‘इश्किया’ में खत्म हो गया था। अब कृष्णा के पात्र में कहने को नया कुछ रह नहीं गया था। ‘इश्किया’ में मुख्य मुद्दा यही था कि कृष्णा इस तरह की क्यों है? वह खालूजान और बब्बन मियां के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करती हैं? और ये रहस्य ‘इश्किया’ में ही साफ हो गया था, इसलिए यदि हम कृष्णा के पात्र को ‘डेढ़ इश्किया’ में लेकर आते, तो फिर वह सिर्फ अटैची की तरह इन दोनों के साथ लगी रहती।

माधुरी दीक्षित को कंविंस कैसे किया?
स्क्रिप्ट लिखते समय जब हमें लगा कि बेगम पारा के किरदार के लिए माधुरी ही ठीक रहेगी तो विशाल ने माधुरी को ईमेल भेजा कि वह एक फिल्म बना रहे हैं क्या वह इससे जुड़ना चाहेंगी। उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें फिल्म ‘इश्किया’ पसंद आयी है। यदि ‘डेढ़ इश्किया’ की स्क्रिप्ट पसंद आएगी तो जरूर करेंगी।

जब माधुरी को ‘डेढ़ इश्किया’ में लेने की सोची तो क्या आपके दिमाग में आया कि शादीशुदा हीरोइनों की वापसी वाली फिल्में सफल नहीं होती?
मैं इस तरह की बातों पर कभी सोचता नहीं। मैंने सिर्फ यह सोचा कि वह बहुत अच्छी अदाकारा हैं। बहुत अच्छी डांसर हैं और एक निर्देशक के तौर पर बेगम पारा के किरदार के लिए मुझे एक कलाकार में जो कुछ चाहिए था, वह सब मुझे माधुरी दीक्षित में मिल रहा था।

सौ करोड़ क्लब पर आपकी राय?
मेरा मानना है कि यदि कोई फिल्म सौ करोड़ नहीं कमाती तो महज इस वजह से उस फिल्म को खारिज कर देना गलत है। कई बार अच्छी फिल्में नहीं चलतीं और बुरी फिल्में भी हिट हो जाती है।

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