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उत्तराखंड-तबाही के बाद की सड़कें और स्कूल

चार साल पहले तक मैं ऊंचाइयों से डरता था। गढ़वाल में 400-600 मीटर की गहरी खाई के ऊपर संकरी, टूटी-फूटी सड़कों पर गाड़ी चलाकर यह ठीक हो गया। जून 2013 की भारी तबाही के बाद हम उन पहाड़ी गांवों में गए, जो पूरी तरह से कटे हुए थे। हम यह देखने गए कि इन गांवों में स्कूलों की हालत कैसी है, क्योंकि बाकी उत्तरकाशी जिले से इनका संपर्क महीनों तक कटा हुआ था। कुछ हजार मीटर तक गाड़ी चलाने के बाद आगे कोई सड़क न थी। हम पैदल चल पड़े। उस रात मैं कर्नल अजय कोठियाल से मिला। वह नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के प्रिंसिपल हैं। उन्होंने दो बार एवरेस्ट पर चढ़ाई की। यहां के स्कूल तबाही के तीन-चार हफ्ते बाद ही खुल गए थे। हालांकि, इसके लिए उन्हें कोई पुरस्कार नहीं मिला। इन्हें चलाने के लिए पढ़ाने के अलावा, कई और काम भी करने पड़ते हैं। जैसे, मिड-डे मील के लिए नमक और चावल लाना, प्रशासन को स्कूल के बारे में बताना, कागज तथा चॉक लाना।

ये काम आसान हैं, पर यहां के लिए कठिन हैं। स्कूल में शिक्षक मौजूद थे। ज्यादातर शिक्षक जहां रहते हैं, वहीं से स्कूल आते-जाते हैं। सड़कों की हालत ऐसी है कि आने-जाने में काफी समय लगता है और इसमें जोखिम भी है। इसलिए कुछ शिक्षक स्कूलों में रुक जाते हैं। ये स्कूल बताते हैं कि जिंदगी में वैकल्पिक रास्ते कैसे बनते हैं। पहले स्कूल में दो शिक्षक और पचास बच्चे थे। हेडमास्टर कुछ महीने पहले यहां तबादला होकर आए हैं। वह खुश नहीं हैं। बच्चों में भी उत्साह नहीं दिखा। वह समझदार इंसान हैं, लेकिन इस बात को जेहन से निकाल नहीं पा रहे हैं कि उनका तबादला कैसे हो गया। वह 20 वर्षों से शिक्षक हैं। दूसरे स्कूल में एक महिला शिक्षक थी। उनके घरवाले पचास किलोमीटर दूर ऊंची पहाड़ियों पर रहते हैं। वह सप्ताहांत वहां जाती हैं।

यहां बच्चे धूप में बड़े उत्साह से खेलते नजर आए। शिक्षिका और बच्चे ऊर्जावान थे। उन्हें पढ़ाना पसंद था, किंतु वह खुद को अकेला पा रही थीं। समाज में मददगार लोग थे, लेकिन परिवार से दूर रहना व्यावहारिक नहीं था। हम तीसरे स्कूल पहुंचे। यह दो कमरे का भवन था। सामने बरामदा था। जब हम पहुंचे, तो वहां 60 बच्चों से घिरे दो शिक्षक दिखे। वे पढ़ाई-लिखाई में मशगूल थे। उन दोनों ने बच्चों को पढ़ाना जारी रखा और बात भी करने लगे। वे 20 साल से शिक्षक हैं। उन्हें अपने काम से लगाव है। यह अच्छा स्कूल था।

दूसरे स्कूल में जो शिक्षिका थीं, वह तीसरे स्कूल के शिक्षकों जैसा या फिर पहले स्कूल के एक शिक्षक जैसा बन सकती हैं। वह कौन-सा रास्ता चुनती हैं, यह कई चीजों पर निर्भर करेगा। लेकिन उनमें से एक चीज यह होगी कि शिक्षा-तंत्र उनकी क्या मदद करता है। लौटते समय हमें भी उत्तरकाशी के लिए न के बराबर सड़कें मिलीं, वे रास्ते जिनसे इन शिक्षकों को हर रोज आना जाना है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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