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राज, राजनीति और भानुमती का कुनबा

अगले चुनाव का चाहे जितना हल्ला-गुल्ला हो, मगर यह बात तय है कि जो खुद तैरना नहीं जानते, वह देश की नैय्या ही तो डुबाएंगे। मजबूरी का मतलब कभी महात्मा गांधी होता था, आज तो उसका मतलब कांग्रेस है। नेताओं द्वारा ठगा गया गरीब कड़ी सर्दी में आप, आप नहीं करेगा तो करेगा क्या। अपनी पिछली कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री जी ऐसे लग रहे थे जैसे पुराने राजा हरिश्चंद्र नए करिया बामन को अपना राजपाट दान में दे रहे हों। उनकी सूरत ऐन गैन सुदामा जैसी लग रही थी। ऐसा विदाई समारोह तो राम जी के वनगमन के टाइम भी नहीं हुआ था। दशरथ जैसे प्रधानमंत्री अब किस कैकेई के भरोसे रहें, ये कांग्रेस हाईकमान को भी नहीं पता। उधर अमेठी में कुमार विश्वास जी राहुल गांधी के सामने ऐसे लग रहे हैं, जैसे अमिताभ बच्चन की बगल में खड़े राजपाल यादव हों। किसे नहीं पता कि टुन्न हुए दरोगा के सामने खड़ा चोर सुरक्षित रहता है।

केजरीवाल की खांसी याने भ्रष्टाचार को फांसी। रामदेव जी तो स्वभाव से आयुर्वेदिक ठहरे। लवण भास्कर चूर्ण की तरह जब चाहो हजम हो जाते हैं। सुना है मायावती की मूर्ति के सामने अन्ना अपनी मूर्ति लगवा रहे हैं, केजरीवाल को चिढ़ाने के लिए। परिवर्तन ही परंपरा को नष्ट करता है। पत्रकार वो जो मुख्यमंत्री के विवेकाधीन कोष से फलता फूलता है। मुङो तो यही चिंता है कि कहीं दिल्ली के इस बदलाव की ये बूंदाबांदी आगे जाकर बाढ़ में न बदल जाए। ये भी सुना है कि आगामी गणतंत्र दिवस के लिए लालकिले को सफेद रंग से पोता जा रहा है ताकि वो मुख्यमंत्री की सफेद टोपी से मैच खा जाए। रहा मफलर तो केजरीवाल जी ने उससे भाजपा और कांग्रेस का मुंह पहले ही बांध दिया है। अब औरंगजेब का पतन दिल्ली में दोबारा होगा। इधर हाल ये है कि अन्ना जी भीष्म पितामह की तरह बाणों की शैय्या पर लेटे लेटे उकता गए हैं। उनका अर्जुन अपना गांडीव गोदाम में रखकर दिल्ली भाग गया है। अब तो इस देश को भ्रष्टाचार ही बचा सकता है। मुंह तक बर्फ जमी हो तो इन दिनों ओम नमो का जाप भी नहीं हो पाता। मुंह से भाप उड़ना इसी को कहते हैं।

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