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करोड़ों में अकेला

अगर किसी शख्स के सामने फिदायीन हमलावर आ जाए, तो उससे क्या उम्मीद की जानी चाहिए? अच्छा चलिए, अपने बारे में ही सोचते हैं। क्या हम भागेंगे या कहीं दूर, किसी आड़ में छिप जाएंगे? क्या दूसरों को भी चेताएंगे कि अपनी जान जोखिम में न डालो? या फिर पीछे किसी महफूज दूरी से तबाही का सारा माजरा देखेंगे? आखिरी इख्तियार हम सबके लिए आसान है, मगर फिदायीन हमले के दौरान इतना वक्त मिलता किसे है। हां, यह तो साफ है कि उस जगह से टस से मस न होना और फिदायीन को वाजिब जवाब देना हम सबके लिए सबसे मुश्किल काम है। लेकिन ऐतजाज हसन ने यही कारनामा कर दिखाया। 14 साल के इस मासूम ने दहशतगर्द से स्कूली साथियों की सलामती के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। उसने सहूलियत और बचने के तमाम रास्ते नहीं चुने, बल्कि जब हर कोई भाग रहा था, वह सूरमाओं की तरह वहीं डटकर फिदायीन का मुकाबला करता रहा और इस तरह फिदायीन स्कूल के अंदर नहीं घुस पाया।

उस दिन उस बच्चे की कुर्बानी का मतलब था सिर्फ एक जिंदगी की शहादत, अगर ऐतजाज न होता, तो स्कूल की दीवारें खून से नहा गई होतीं। कई जिंदगियों पर कहर बनकर टूटने की खातिर दहशतगर्द अपनी जान देने से भी बाज नहीं आते, मगर इन कातिलाना करतूतों के पीछे एक आसान-सी वजह है। वह है, अवाम तक यह पैगाम पहुंचाना कि दहशतगर्द अपने मकसद की खातिर बेखौफ हैं और किसी भी हद तक जा सकते हैं। नेमतों से बख्शी यह जिंदगी, चाहे वह उनकी हो या किसी दूसरे की, उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। इसलिए इस मुल्क में नाउम्मीदी पसरी हुई है। इसका एक मतलब यह हुआ कि दहशतगर्द अपने नाम के हिसाब से अपने मनसूबों में कामयाब हो रहे हैं। हर कोई उनसे खौफ खाता है, सिवाए ऐतजाज जैसे कुछ दिलेरों के। ऐतजाज ने उस भीड़ का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया, जो डरी हुई थी। उसने हमले को वहां होने से रोका, जहां के बारे में दहशतगर्द ने सोच रखा था। हममें से ज्यादातर तालिबान से हारे लोग हैं, सामने न सहीं, तो दिल ही दिल में जरूर और आज हमारी सलामती के लिए एक 14 साल का मासूम कुर्बान हो गया।  
द नेशन, पाकिस्तान

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