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बदले हैं अंदाज

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि भ्रष्टाचार के मामले में पहले शीला दीक्षित के विरुद्ध जांच होगी, तभी कार्रवाई संभव है। दो साल पहले, रामलीला मैदान में आंदोलन के दौरान केजरीवाल ने दावा किया था कि उनके पास शीला के खिलाफ 370 पेज के दस्तावेजी सबूत हैं, जो उन्हें जेल भेजने के लिए पर्याप्त हैं। शीला दीक्षित मंत्रिमंडल के एक सदस्य की तो लोकायुक्त द्वारा जांच भी हो चुकी है और वह दोषी ठहराए जा चुके हैं। उन्हें पहले पूर्व मुख्यमंत्री बचा रही थीं। और अब केजरीवाल बचा रहे हैं, क्योंकि इस मामले में उन्होंने पूर्ण मौन धारण कर लिया है। सत्तासीन होने से पहले वह उस मंत्री को तत्काल जेल भेजने की मांग करते थे।
अजय मित्तल, मेरठ
rashtradevmeerut@gmail.com

नेताओं के लिए नियम

आजकल टोल रोड पर हर जगह गुंडागर्दी दिखाई दे रही है। समाजवादी पार्टी के तथाकथित नेता टोल टैक्स देना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। इसलिए यहां-वहां टोल टैक्स मांगने वालों से मार-पिटाई करते देखे जा सकते हैं। दरअसल, इसका मुख्य कारण हमारे देश में नेताओं व सांविधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों को टोल टैक्स में छूट मिल जाता है। क्या हमारे नेता व अन्य पदाधिकारी इतने भी सक्षम नहीं हैं कि 25 रुपये टोल टैक्स के रूप में दे सकें? अगर ये छूट मिलनी बंद हो जाए, तो तथाकथित नेताओं की गुंडागर्दी अपने आप बंद हो जाएगी। हम देखते हैं कि बसों में भी हमारे जन-प्रतिनिधियों के लिए सीट आरक्षित होती है, लेकिन कितने नेता आज बसों में सफर कर रहे हैं? बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आम जनता के लिए आज कहीं कोई सुविधा नहीं है और जिन्हें ऐसी सुविधाओं की जरूरत नहीं है, उनके लिए सभी किस्म की सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
प्रेम कुमार सिंह, बुलंदशहर, उ.प्र.
prem.chauhan28@gmail.com

बैंक की दिक्कत

आधार कार्ड व गैस के लिए बैंक में खाता जरूरी बनाकर आम आदमी को मुश्किल में पहले ही डाल दिया है। फिर तकनीकी पेच यह है कि बैंक कहां हैं? यदि बदरपुर को लें, तो बदरपुर में छह बैंक हैं, जैतपुर में दो, मीठापुर में एक सहकारी बैंक है। इलाके की बड़ी कॉलोनी मोलड़बंद में एक भी बैंक नहीं है। जब हर गैस होल्डर को एक खाता बैंक में चाहिए, तो कहां धक्के खाए? सरकारी बैंक पहले ही अपनी हठधर्मी के लिए मशहूर हैं। जब बैंकों के रवैये को नहीं सुधार सकते, तो आम आदमी से क्या उम्मीद कर सकते हैं?
एस एस राठौर, बदरपुर
shailandra7@gmail.com

सार्थक बहस जरूरी

कश्मीर समस्या पर जब-जब खुलकर संवाद होता है, तभी देखने मे आता है कि कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग हाय-तौबा मचाना शुरू कर देते हैं। कम ही लोग कश्मीर के साथ कश्मीरियों की बात करते हैं। जबकि कश्मीर की स्थिति देखकर लगता है कि सबसे अधिक विनाश और तकलीफ वहां के लोगों ने ङोले हैं। कश्मीर के साथ वहां के निवासियों और वहां के अल्पसंख्यक वर्ग की चिंता करने की जरूरत है। शासन स्तर पर भी वहां विकास-कार्य नही हुए हैं और जो थोड़े-बहुत प्रयास हुए भी हैं, वे भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। इसलिए इस विषय पर खुलकर और सार्थक चर्चा की जरूरत है।
जुल्फिकार, एएमयू, अलीगढ़
zulf0125@rediffmail.com

दंगों पर सियासत

मुजफ्फरनगर दंगों पर जैसी सियासत हुई है, वह अफसोसनाक है। सभी सियासीपार्टियों का रवैया एक सा है। वहां सभी पार्टियों के दिग्गज नेताओं ने दौरा किया, पर इससे पीड़ितों को कोई लाभ नहीं मिल पाया। यदि इन दौरों से राहत मिलती, तो ठंड से बच्चों की मौत नहीं होती। सरकार के तमाम दावों की पोल मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों की बदहाली और बेबसी खोल रही हैं। आगामी लोकसभा चुनावों के लिए दंगों पर सियासत करके जमीन तैयार की जा रही है।
सूरज भान सिंह, शक्तिनगर, सोनभद्र

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