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योद्धा ही नहीं कुशल रणनीतिकार भी थे सैम बहादुर

भारतीय सेना के जांबाज सिपाहियों की कमान संभाले फील्ड मार्शल मानेकशॉ ने 1में पाकिस्तान से हुए युद्व में रणकौशल का बेहतरीन और अचूक प्रदर्शन करते हुए पाक सैनिकों को नाकों चना चबवा दिए और उन्हें घुटने के बल झुकने को मजबूर कर दिया। मानेकशॉ की इस रणनीतिक कुशलता और गजब की दिलेरी दिखाने पर उन्हें फील्ड मार्शल की उच्चतम उपाधि से सम्मानित किया गया। यह उपाधि पाने वाले दो भारतीयों में वह पहले थे। दूसरे थे फील्ड मार्शल के करियप्पा। तीन अप्रैल 1ो पंजाब के अमृतसर में जन्में फील्ड मार्शल सैम होरमुखजी फ्राम जी जमशेद जी मानेकशॉ ने अपने जीवन के चालीस दशक सेना में बिताए। इस दौरान उन्होंने दूसरे विश्व युद्व के अलावा चीन और पाकिस्तान के साथ हुए युद्वों में भी भाग लिया। पाकिस्तान के साथ हुए तीसरे युद्व में उन्होंने पौरुष और पराक्रम का जो मुजाहिरा करते हुए जीत हासिल की उसे युद्व के हाल के इतिहास की सबसे तेज हासिल करने वाले जीतों में गिना जाता है। बुलंद हौसले और हिम्मत वाले मानेकशॉ पारसी माता पिता की संतान थे जो गुजरात के सूरत के निकट वलसाड से अमृतसर आ गए थे। उनकी आंरभिक शिक्षा दीक्षा वहीं सम्पन्न हुई। इसके बाद वह उत्तराखंड के नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में भी अध्ययन के लिए पहुंचे। फील्ड मार्शल मानेकशॉ ने एक अक्टूबर 1ो सेना में भर्ती हुए। उन्हें भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) के पहले बैच के 40 रंगरुटों में शामिल में होने का गौरव भी हासिल है। दिसबंर 1में आईएमए से विदा लेने के बाद मानेकशॉ ने कई रेजीमेंटों में काम किया लेकिन सबसे पहले उन्होंने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की रायल स्कॉट सेना से अपने सैनिक जीवन की शुरुआत की। लेकिन उनकी हिम्मत उत्साह और ऊंचे हौसले को देखते हुए उन्हें उस समय की सेना की तेजतर्रार फ्रंटियर फोर्स रेजीमेंट में भेज दिया गया। अपने साथियों में सैम बहादुर के नाम से मशहूर फील्ड मार्शल मानेकशॉ को दूसरे विश्व युद्व में इसी फ्रंटियर फोर्स रेजीमंेट की 412 टुकड़ी का कैप्टन बना कर पड़ोसी देश बर्मा की सितांग नदी के रणक्षेत्र मंे उतारा गया। नौजवान मानेकशॉ को जापान की सेना से दो-दो हाथ करने का मौका मिला। जांबाजी दिखाने को मिले इस मौके पर मानेकशॉ ने जापानी सेना के छक्के छुड़ा दिए। मानेकशॉ ने ऐसा घनघोर साहस और वीरता का परिचय दिया कि ब्रिटिश सेना ने उन्हें युद्वक्षेत्र में ही पुरस्कृत किया जैसा कम ही होता है। बहादुरी और कर्तव्यपरायणता की मिसाल मानेकशॉ तब माने जाने लगे जब जापानी सेना के साथ युद्व करते हुए उनको एलएमजी की गोलियां पेट मंे आकर लगीं और वह बहुत बुरी तरह घायल हो गए। तत्कालीन मेजर जनरल डीटी कॉवन मानेकशॉ की शेरदिली और बहादुरी से प्रभावित हुए और उन्होंने युद्वक्षेत्र में ही मानेकशॉ की वर्दी में अपना मिल्रिटी क्रॉस जड़ दिया। बर्मा में मौत को बेहद करीबी से मात देने के बाद मानेकशॉ को क्वेटा के स्टाफ कॉलेज में भेजा गया। उसके बाद एक बार फिर जंगजू नवयुवक मानेकशॉ को बर्मा मंे जापानी सेना के साथ भिड़ने का मौका मिला। जहां एक बार फिर उनका जीवन खतरे में पड़ गया। किस्मत के धनी मानेकशॉ ने एक बार फिर मौत को मात दे दी। दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के दौरान उन्हें चीन के सीमावर्ती इलाकों में भेजा गया जहां उन्होंने दस हजार से अधिक शरणार्थिआें के पुर्नवास में मदद की। फील्ड मार्शल मानेकशॉ ने 1े विभाजन के दौरान प्रशासनिक क्षमता, योजना बनाने और उसे क्रियान्वित करने का अद्भुत परिचय दिया। उसके बाद कश्मीर पर पाकिस्तानी हमले के दौरान उन्होंने अपने सैनिक अनुभव का परिचय दिया। उसके बाद मानेकशॉ को गोरखा रायफल्स में बतौर कर्नल के पद पर भेजा गया। यहां से उनका गोरखा रायफल्स के साथ जो सफर शुरू हुआ वह सेना में उनकी सेवा के अंत तक बना रहा। इसकी एक वजह यह भी थी कि मानेकशॉ सैन्य जीवन की शुरुआत में जिस फ्रंटियर फोर्स रेजीमंेट में बतौर सेकेण्ड लेफ्टिनेंट नियुक्त हुए थे उसे देश के विभाजन के कारण पाकिस्तान को सौंप दिया गया था। फील्ड मार्शल मानेकशॉ को सरकार ने हिंसा से जूझ रहे नगालैण्ड में भी जीआेसी इंचार्ज के रूप मंे भेजा जहां उन्होंने नागरिकों की जान बचाई। देशसेवा में इस योगदान के लिए राष्ट्र ने 1में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। उन्हें सात जून 1ो चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बनाया गया। इसी दौरान पूर्वी पाकिस्तान से हजारों की संख्या में शरणार्थिआें का आगमन शुरू हो गया और नागरिक प्रशासन की धीरे-धीरे स्थिति बिगड़नी शुरू हो गई। सन 1े आते आते पाक के साथ एक और जंग के बादल घुमड़ने लगे।

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