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बड़े सियासी दलों को धूल चटा पाएंगे छोटे दल?

उत्तर प्रदेश की सियासत का पारा लोकसभा चुनाव करीब आने के साथ-साथ और गरम होता जा रहा है। बड़े सियासी दल जहां अपने दिखाऊ और वोट जिताऊ चेहरों के सहारे चुनावी महायुद्ध में जीत की रणनीति बना रहे हैं, वहीं इन चुनावी सूरमाओं को मात देने के लिए छोटे दल भी अपनी खिचड़ी अलग पकाने में लगे हुए हैं। बीते विधानसभा चुनाव में उन्हें कुछ हद तक सफलता मिली थी, इसलिए अब वह लोकसभा चुनाव में भी इसे दोहराना चाहते हैं।

छोटे द्वारा जातिगत समीकरण बैठाकर चुनावी हवा अपने पक्ष में करने की रणनीति की बात करें तो पीस पार्टी के डॉं. अय्यूब ने अपना दल और बुंदेलखंड कांग्रेस से गठबंधन कर विधानसभा में अपने घटक के लिए पांच सीटें हासिल की थीं। जिसमें एक सीट अपना दल व चार सीट पीस पार्टी को मिली व बुंदेलखंड कांग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल सकी थी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय परिवर्तन दल के डी.पी. यादव को सपा में भले ही शामिल नहीं किया था पर बरेलवी मुसलमानों के धर्मगुरु व इत्तेहादे मिल्लत काउंसिल के प्रमुख तौकीररजा बरेलवी ने विधानसभा में एक सीट हासिल की थी, जिसमें शहजुल इस्लाम जीते थे अब वह लोकसभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) से गठबंधन कर चुनाव की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि शहजुल इस्लाम पार्टी छोड़कर सपा में शामिल हो गए हैं।

पूर्वाचल में कौमी एकता दल के मुख्तार अंसारी ने सात छोटी-छोटी पार्टियों, केशव देव मौर्य-महान दल, डीपी यादव-परिवर्तन दल, ओमप्रकाश राजभर-भारतीय समाज पार्टी, गोपाल निषाद-फूलनदेवी सेना, ओमप्रकाश चैहान-जनवादी पार्टी, अदालत प्रसाद कोल-कोल आदिवासी संघ और रामसागर बिंद सरोजन-विकास पार्टी के साथ गठबंधन कर विधानसभा में दो सीटें हासिल की थीं। स्वयं मुख्तार अंसारी उनके भाई सिब्गतुल्ला अंसारी चुनाव जीते, शेष सभी दलों के प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी।

इस गठबंधन ने एक बार फिर लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए घोषणा की है। वही बाबूसिंह कुशवाहा की जनाधिकार मंच के अलग होने से इन दलों को बुंदेलखंड में नए रास्ते तलाशने पड़ सकते हैं।

हालांकि जिस तरीके से दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) ने कांग्रेस के जबड़े से सत्ता छीनी है, उसके बाद इस बात की भी अटकलें लगाई जाने लगी हैं कि वह यूपी में भी अपने प्रतिद्वंदियों की जीत की राह में रोड़ा बन सकती है। अपना अस्तित्व बनाने में लगे इन छोटे दलों को भी आप के कारण नुकसान उठाना पड़ सकता है, लेकिन बड़ा खतरा बड़े सियासी दलों को हो सकता है। हालांकि राजनैतिक विश्लेषक दिल्ली विधानसभा चुनाव को लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखने के सहमत नहीं है।

दिल्ली के मुकाबले यूपी का चुनाव पूरी तरह से जातीय समीकरणों में जकड़ा हुआ है। कुछ सीटों पर चर्चित चेहरों को छोड़ दें तो ज्यादातर जगह जातीय समीकरण ही हार-जीत का आधार बनते हैं। ऐसे में आप की राह उतनी आसान नहीं है। उधर चुनावी महासमर में सभी दल उत्तर प्रदेश में दमदार प्रदर्शन का दावा कर रहे हैं।

सपा प्रवक्ता राजेंद्र चैधरी ने जहां 50 सीटों पर पार्टी की जीत तय मान रहे हैं। वहीं बसपा प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य सपा, कांग्रेस और भाजपा को जनता द्वारा नकारे जाने की बात कहकर अपनी पार्टी का झंडा बुलंद होने का दावा कर रहे हैं।

दूसरी ओर, मोदीमय हो चुकी भाजपा नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री होने पर किसी तरह की शंका से ही इनकार कर रही है। ऐसे में छोटा-छोटा कुनबा बनाकर सियासत में अपना भविष्य आजमाने वाले छोटे दल इन बड़े राजनैतिक दलों के बीच कितने कामयाब हो पाएंगे या फिर जनता वास्तव में किस पर भरोसा जताएगी, इस सवाल का जवाब भविष्य ही दे पाएगा।

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