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कोइराला के बाद

प्रधानमंत्री गिरिाा प्रसाद कोइराला के इस्तीफे के बाद नेपाल में माओवादियों के नेतृत्व में सरकार के गठन का रास्ता साफ हो गया है, लेकिन यह देखना बाकी है कि भविष्य में राजनीतिक समझदारी और आम सहमति से आगे बढ़कर नेपाल को एक टिकाऊ संविधान और शासन प्रणाली देने में सभी पक्ष पर्याप्त परिपक्वता का परिचय देते हैं या नहीं। यह शंका इसलिए भी पैदा होती है, क्योंकि गत अप्रैल में संविधान सभा के चुनावी नतीजे आने के बाद माओवादियों और अन्य राजनीतिक दलों में लगभग दो महीने तक तीव्र खींचतान और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चला था। चुनाव में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने से जटिलताएं पैदा होना अस्वाभाविक नहीं था, पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के नेता प्रचंड कभी बहुत गरम तो कभी नरम तेवर अपनाते रहे थे। सत्ता पर जबरन कब्जे का इशारा करने से वह नहीं चूके थे। इस तनातनी के बावजूद कोइराला ने इस्तीफा देने में काफी देर कर दी, जबकि अत्यंत अनुभवी और दूरंदेशी नेता होने के नाते स्थितियां भांपकर यह कदम समय रहते ही उठा लेना चाहिए था। कोइराला फिलहाल कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे और कुछ समय बाद चुने जाने वाला राष्ट्रपति उनका इस्तीफा मंजूर करगा। राजशाही की तानाशाही के खिलाफ माओवादियों और अन्य दलों में एक-दूसर का साथ देते हुए देश को लोकतांत्रिक प्रक्रिया की ओर ले जाने की जो सामंजस्यपूर्ण भावना पैदा हुई थी, इन चुनावों के बाद वह कड़वाहट में तब्दील हो गई। इसे भुलाकर ही विभिन्न राजनीतिक पार्टियों- चाहे वे माओवादी हों या अन्य, को आगे बढ़ना होगा, तभी देश को एक स्थायी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली प्रदान की जा सकती है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस्तीफे की कोशिश के बाद कोइराला की पार्टी नेपाली कांग्रेस नई सरकार में शामिल होगी या नहीं, पर अनुभवी राजनेता के नाते उनसे उम्मीद है कि वे अपना योगदान जारी रखेंगे। माओवादियों और प्रचंड भी अड़ियल रवैया नहीं, बल्कि अन्य सभी दलों के साथ आम सहमति कायम कर ही बढ़ पाएंगे। इसी में सभी दलों और देश की भलाई निहित है।

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