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क्योंकि ये हाइवे हैं हमारी धमनियां

बड़े शहरों को जोड़ने वाले अपने हाइवे भी देश की धमनियां हैं। शहरों और गांवों को जोड़ने वाली छोटी सड़कें शिराएं हैं। वे अपनी तरह से देश की आर्थिक सेहत में हिस्सेदारी करती हैं। अपने हाइवेज के बार में जितना मैंने सुना या जाना है उसके लिहाज से तो वे बुर हाल में हैं। यह हम सभी हिंदूुस्तानियों के लिए परशानी का सबब है। जनरल बी. सी. खंडूरी जब वाजपेयी सरकार में थे, तो उन्होंने तमाम हाइवे दो लेन का करने के लिए अच्छा-खासा काम किया था। लेकिन उनके बनते ही गाड़ियों की तादाद भी बेतरह बढ़ गई। पिछले महीने मैं अपने बेहद खास हाइवे एन. एच. वन से गुजरा था। हरियाणा पुलिस की एस्कॉर्ट की वजह से मेरा सफर तो आराम से हो गया था। लेकिन मैंने जगह-ागह अच्छा-खास जाम देखा था। पिछले साल तक मेर दोस्त चंडीगढ़ से गाहेबगाहे कसौली में डिनर पर चले आते थे। वे महा डेढ़ घंटे में सफर तय कर लेते थे। इस बार कोई आने को तैयार ही नहीं था। आखिर कौन चार घंटे आने और चार घंटे जाने में बर्बाद करना चाहेगा?ड्ढr उत्तर प्रदेश में भी हाइवे बेहतर हाल में नहीं हैं। मेरी बेटी का रानीखेत में घर है। पिछले साल उसे जिस सफर में साढ़े चार घंटे लगते थे, अब नौ घंटे लग रहे थे। मैं रिपोर्ट पढ़ता रहता हूं मुंबई से पुणे और गोवा या कर्नाटक के हाइवे की। एक वक्त चंद्रबाबू नायडू ने हैदराबाद और विशाखापटनम की सड़कों को आधुनिक बनाने का काम किया था। मुझे नहीं लगता कि उस रफ्तार को अब कायम रखा गया होगा। अब हमें दो लेन के हाइवे नहीं चाहिए। अब तो चार लेन के हाइवे की दरकार है। अगर छह लेन के हों, तो बेहतर है। उसमें भी गाड़ियों की स्पीड के हिसाब से लेन रिार्व हों, तो अच्छा। एक कार और मोटर साइकिल के लिए दूसरी बस, ट्रक और टैंकरों के लिए और तीसरी साइकिल और धीमे ट्रैफिक के लिए। सड़कों पर बाड़ लगानी चाहिए ताकि पालतू जानवर वगैरह वहां न आने पाएं। पैदल वालों के लिए अलग इंतजाम होने चाहिए। ये सब जल्द से जल्द होना चाहिए। आखिर हमारी खुशहाली इन्हीं हाइवे पर टिकी हुई है। अमिताभ घोष अमिताभ घोष की नई किताब अंग्रेजी दुनिया में एक खबर होती है। सो, वाइकिंग पेंगुइन से आये उनके नवें उपन्यास ‘सी ऑफ पॉपीा’ का खासतौर से हिंदुस्तान में तो स्वागत हो रहा है। अमिताभ की खासियत यह है कि उन्होंने कोई दोयम दर्जे की रचना नहीं की। दूसर लेखक अपनी एक-दो बेहतरीन किताबों के बाद चुक से जाते हैं लेकिन अमिताभ घोष नहीं। यह ‘सी ऑफ पॉपीज’ भी पढ़ने का मजा देती है। एक और खासियत है अमिताभ घोष की। वह अपने हर उपन्यास में कुछ खास सूचनाएं देते हैं। उन सूचनाओं को वह कहानी में उतारते हैं। ‘द कैलकटा क्रोमोसोम’ में वह मलेरिया के मच्छर की तहकीकात करते हैं। ‘द हंगरी टाइड’ में वह सुंदरबन के बाघ और लोगों की पड़ताल करते हैं। ‘सी ऑफ पॉपीज’ आपको अफीम की खेती की ओर ले जाती है। वह बताते हैं कि कैसे पूर्वी उत्तर प्रदेश में गोर साहबों के हुक्म पर अफीम की खेती होती थी। फिर उसे गाजीपुर में प्रोसेस किया जाता था। वहां गंगा से उसे कोलकाता पहुंचाया जाता था। फिर वह शिप से चीन ोज दिया जाता था। उससे ईस्ट इंडिया कंपनी के गोर नवाबों की जमकर कमाई होती थी। गाजीपुर के एक गांव से वह कहानी शुरू होती है। लोगों से उसकी खेती के लिए हुक्म दिया जाता है। उसे गाजीपुर की फैक्ट्री में लाने को कहा जाता है। वहां से उसे ठीकठाक कर शिपिंग के लिए तैयार किया जाता है। वहां के लोग अफीम की खेती करने के चक्कर में और कोई फसल उगा नहीं पाते। जाहिर है वे हमेशा भूखे ही रहते हैं। उन्हें अफीम लेने की आदत पड़ जाती है। वे जाति में भी जकड़े हुए हैं। अंधविश्वास के मार हैं। उपन्यास की नायिका सती है। उसे अपने पति की चिता से बचाया गया है। चीन अफीम के कारोबार पर पाबंदी लगा देता है। गुस्साए ब्रिटिश खुले कारोबार के नाम पर हमला बोल देते हैं। फिर कहानी के भीतर से कहानी निकलती है। हत्या, सेक्स सब कुछ है उसमें। तीन भागों में लिखे जाने वाले उपन्यासों में यह पहला है। उसे जरूर पढ़ा जाना चाहिए।

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