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त्याग के साथ भोग!

ईश का वास तो है इस जगत में। यानी ईशावास्य मिदं सर्वम्, यत् किम् च जगत्यां जगत्। लेकिन उस जगत में वास कैसे किया जाए? ईशोपनिषद् के उस महामंत्र की दूसरी लाइन उसका सूत्र देती है। तेन त्यक्तेन भुंजीथा: मा गृध: कस्यस्विद् धनम्। गजब का विरोधाभासी, लेकिन कमाल का सूत्र! त्याग करते हुए भोगते चलने की बात। त्याग और भोग साथ-साथ। त्यागी तो योगी होता है। और भोगी संसारी। तब.? दरअसल, यह योगी और भोगी दोनों अपने भीतर ही हैं। हमें उसमें संतुलन बिठाना होता है। हम त्याग भी करते हैं और भोग भी। लेकिन हम कितना त्याग करते हैं और कितना भोग? यही बड़ा सवाल है। हम जब कम से कम भोग करते हैं, तो योगी हो जाते हैं। अपनी जरूरत के लिए ले लिया और बाकी दूसरों के लिए छोड़ दिया। यानी मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखो जाए। हम अपने लिए लें, लेकिन धरती पर बोझ न बनें। धरती पर कृतज्ञता भाव से रहें। धरती से लें, लेकिन उसे कम से कम नुकसान पहुंचाएं। अपने लिए दुनिया से लेना और बाकी दुनिया को दे देना ही त्याग करते हुए भोगना है। भावना त्याग की रहनी चाहिए। भोग कम से कम होना चाहिए। उतना ही जितना जीवन जीने के लिए जरूरी हो। उससे ज्यादा अगर हमने जोड़ लिया है, तो उसे छोड़ने में कोताही नहीं होनी चाहिए। वह हमें खुशी से छोड़ देना चाहिए। अपनी तो आरण्यक संस्कृति रही है। यानी वन को हम बहुत महत्ता देते रहे हैं। जंगली हमार लिए गाली कभी नहीं रहा। अपने ऋषि मुनि तो वन में रहते थे। उसमें कुटिया छवाते थे। अपने भर के लिए ही वह प्रकृति से मांगते थे। किसी पेड़-पौधे से जड़ी-बूटी तक तोड़ने से पहले वे उससे क्षमायाचना करते थे। उस पेड़ को जड़ से कभी खत्म नहीं करते थे। उससे लेते थे, तो उसकी देखरख भी करते थे। हम धरती से लें। लेकिन इतना ही लें कि अपना काम चल जाए। बाकी को दे दें। यही त्याग के साथ भोग है।

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  • Web Title: त्याग के साथ भोग!