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सबको पानी देने की कठिन राह

बारहवीं पंचवर्षीय योजना में भारत के जल प्रबंधन में क्रांतिकारी परिवर्तन की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। पिछले छह दशकों के अनुभव के आधार पर यह स्वीकारा गया है कि बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाने की संकीर्ण यांत्रिकी-केंद्रित सोच को एक विकेंद्रीकृत, जन-आधारित प्रबंधन व्यवस्था में तब्दील करना होगा। हमारा एक मुख्य प्रस्ताव शहरी क्षेत्र में जल-प्रबंधन के बारे में है। देश के शहरी क्षेत्रों में पानी और साफ-सफाई की समस्या ग्रामीण क्षेत्रों से भी ज्यादा विकट है।

ज्यादातर शहरों में पानी की आपूर्ति का स्नोत बहुत दूरी पर है और पंपिंग के साथ-साथ पाइप-लाइन की लंबाई भी लागत का निर्धारण करती है। जलापूर्ति के मौजूदा ढांचे में लीकेज और कुप्रबंधन के कारण बहुत बर्बादी होती है। फिर शहरों की जल आपूर्ति में बहुत ज्यादा असमानता है, जिसकी सबसे गहरी मार गरीबों पर पड़ती है। पानी का कनेक्शन न होने से उन्हें पानी के लिए बहुत पैसा और समय लगाना पड़ता है।

जलापूर्ति के साथ-साथ हमें मल की भी चिंता करनी होगी। मल आखिर नदी, तालाब, पोखर या भूगर्भ में ही जाता है और इससे जलापूर्ति की व्यवस्था इस कदर प्रदूषित होती है कि उसका असर सेहत पर पड़ता है। इससे पानी के प्रदूषण का एक प्राणघाती दुष्चक्र चल पड़ता है। भूजल प्रदूषित होने पर शहरों से दूर जलापूर्ति के नए स्नोत तलाशने के सिवा कोई और चारा नहीं बचता। दूरी बढ़ने के साथ पंपिंग और जलापूर्ति का खर्च बढ़ जाता है।

वर्ष 2011 की जनगणना बताती है कि केवल 32.7 फीसदी शहरी आबादी नलों की पाइपदार प्रणाली से जुड़ी है। शहरों में 12.6 फीसदी यानी तकरीबन पांच करोड़ लोग खुले में शौच करते हैं। शहरों की ज्यादातर आबादी अनधिकृत कॉलोनियों या अवैध क्षेत्रों और झुग्गी-बस्तियों में रहती है, जहां सरकारी सुविधाएं नहीं होतीं। अगर मल निकासी की व्यवस्था ऐसी नहीं है कि उससे तमाम आबादी के मल को एकत्र करके कुशलता के साथ निपटान किया जा सके, तो फिर प्रदूषण पर अंकुश नहीं लगेगा। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आकलन के अनुसार, देश में जितना मलोत्सजर्न होता है, फिलहाल, उसके मात्र 30 फीसदी की सफाई क्षमता मौजूद है। फिर मलजल शोधन के कुछ संयंत्र उच्च लागत (बिजली और रासायनिक पदार्थ) के कारण काम नहीं करते, जबकि कुछ ऐसे भी हैं, जहां सफाई के लिए पर्याप्त मात्रा में मलजल मौजूद नहीं है। ज्यादातर शहरों में मलजल का थोड़ा-सा हिस्सा ही सफाई के लिए पहुंचता है।
यही सब देखते हुए 12वीं पंचवर्षीय योजना में एक क्रांतिकारी परिवर्तन का सुझाव रखा गया है। जलापूर्ति के मद में होने वाला निवेश मांग की प्रकृति के अनुकूल होना चाहिए, ताकि शहर के विभिन्न हिस्सों में पानी के असमान वितरण को कम किया जा सके और आपूर्ति किए जा रहे पानी की गुणवत्ता बढ़े। जरूरी है कि नगर-योजना में जोर पानी की बर्बादी को कम करने पर हो। इसके लिए मीटरों के व्यापक इस्तेमाल और कार्यदक्षता के अभियानों का सहारा लिया जाना चाहिए। पानी का उपभोग-शुल्क कुछ इस तरह से तय किया जाना चाहिए कि उससे संचालन और रख-रखाव के मद में होने वाला खर्च निकल सके, साथ ही ‘लाइफ लाइन’ पानी लोगों को नि:शुल्क मिले, और अगर इससे ज्यादा पानी खर्च हो, तो उस पर बढ़ती दर के साथ लागत वसूली जाए।

हर शहर को जलापूर्ति का प्रथम स्नोत स्थानीय स्तर पर खोजना होगा। शहरों को जल-परियोजनाओं के लिए धन तभी दिया जाए, जब वे स्थानीय जलस्नोतों और जलागम क्षेत्रों से जलापूर्ति को रजामंद हों। इससे आधारभूत ढांचे का निर्माण और उसकी रक्षा होगी और इसके जरिये जलापूर्ति और मलजल की निकासी स्थानीय स्तर पर हो सकेगी। इससे पाइप-लाइन की लंबाई दो तरह से कम हो जाएगी- एक तो जलापूर्ति के लिए कम लंबाई की पाइप-लाइन बिछानी होगी, दूसरे मलजल की निकासी के लिए भी कम लंबी पाइप-लाइन लगेगी।

जरूरी है कि मलजल निकासी की व्यवस्था के बिना किसी भी जल योजना को मंजूरी नहीं दी जाए। मल के शोधन-निस्तारण के बारे में प्रचलित पद्धतियों से अलग हटकर सोचना भी जरूरी है। मसलन, गंदे जल की सफाई की वैकल्पिक जैवीय (बॉयलॉजिकल) पद्धतियों में बैक्टीरिया का उपयोग होता है। बैक्टीरिया मलजल में मौजूद जीवाणविक पदार्थों को अपना आहार बनाते हैं और इस तरह पानी में मौजूद जैवीय घटकों में कमी आती है। इस प्रक्रिया में यह ध्यान रखना जरूरी है कि मलजल निकासी की व्यवस्था के निर्माण का खर्च कम करना है, मलजल निकासी के नेटवर्क की लंबाई कम करनी है और मल को एक संसाधन मानकर बरतना है। शोधित मलजल का इस्तेमाल खेती-बाड़ी, जलस्त्रोतों की भराई, बागवानी, उद्योग तथा घरेलू इस्तेमाल के लिए किया जा सकता है। ऐसे हर मामले में शोधन-संयंत्र अलग किस्म का बनाना होगा, लेकिन हर मामले में शोधित मलजल जलचक्र को सुधारने वाला साबित होगा। पर्यावरण में मल नहीं, बल्कि पानी की वापसी होगी।

भूगर्भीय जल भारत में पानी का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्त्रोत है और इसे ध्यान में रखते हुए बारहवीं योजना ने भूजल के मापन और प्रबंधन के एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम की शुरुआत की है। भूगर्भीय जल की भागीदारीपरक, टिकाऊ तथा समतापरक व्यवस्था बनाने के लिए इसका प्रबंधन एकदम स्थान-विशेष की संवेदनशीलता के हिसाब से किया जाएगा।

बारहवीं पंचवर्षीय योजना में प्रस्तावित इस व्यापक सुधार-योजना को देखते हुए यह बात बड़ी निराशाजनक लगती है कि आम आदमी पार्टी 666 लीटर मुफ्त पानी मुहैया कराने के अपने एजेंडे को लागू करने में जल्दबाजी से काम ले रही है। ऐसे में, बड़ी आशंका है कि दिल्ली की वह आबादी, जिसे अभी तक सीधे कनेक्शन से नल का पानी हासिल नहीं है, वह पानी से और भी ज्यादा वंचित हो जाएगी। आम आदमी पार्टी के घोषणापत्र में दिल्ली में पानी की समस्या पर बहुत बारीकी से विचार किया गया है। घोषणापत्र में बड़े साफ-साफ शब्दों में कहा गया है कि दिल्ली की 30 फीसदी आबादी वाटर-कनेक्शन से वंचित है। घोषणापत्र में यह भी कहा गया है कि दिल्ली के 17 लाख घर साफ-सफाई (सैनिटेशन) की सुविधा से वंचित हैं। ऐसे में अगर जिन्हें पहले से ही पानी मिल रहा है, उन्हें मुफ्त पानी देकर राजस्व का नुकसान किया जाता है, तो फिर बिना वाटर-कनेक्शन वाले लोग और भी ज्यादा वंचित हो जाएंगे। आम आदमी पार्टी को जिस तरह का विशाल जन-समर्थन मिला है, उसे देखते हुए महसूस होता है कि पार्टी को इस तरह के लोक-लुभावन, लेकिन हानिकारक निर्णय लेने की जरूरत ही नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि ‘आप’12वीं पंचवर्षीय योजना तथा अपने घोषणापत्र को लागू करने की दिशा में समग्र कार्य योजना बनाने का प्रयास करेगी। इस प्रयास में योजना आयोग का पूर्ण सहयोग उसे प्राप्त होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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