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सार्वजनिक संसाधनों की लूट को रोकने की राह

लोकपाल विधेयक पर राज्यसभा में हुई बहस के दौरान हमने विधेयक में एक ठोस संशोधन पेश किया था। संशोधन का आशय यह था कि ऐसी निजी कंपनियों को और खासतौर पर ऐसी निजी-सार्वजनिक साङोदारी परियोजनाओं को लोकपाल की छानबीन के दायरे में लाया जाए, जो सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग करती हैं या सरकार से जिनका वित्तीय लेन-देन का रिश्ता बनता है। हालांकि, वहां तो यह संशोधन गिर गया, लेकिन इस संदर्भ में दिल्ली हाईकोर्ट का हाल का फैसला बहुत महत्वपूर्ण है, जो निजी दूरसंचार कंपनियों को नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक के ऑडिट के दायरे में लाता है, वाकई बहुत ही महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट के पीठ ने अपने निर्णय में ‘रेस काम्यूनेस’ की अवधारणा का सहारा लिया है, जो यह कहती है कि प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण, एक न्यासी के रूप में शासन के हाथों में रहता है और शासन की यह जिम्मेदारी बनती है कि अगर ये संसाधन निजी हाथों में दिए जाते हैं, तो इन पर समुचित नियमन सुनिश्चित करे। इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि सीएजी अपना ऑडिट, पांच निजी दूरसंचार कंपनियों की राजस्व प्राप्तियों के ऑडिट तक सीमित रखेगी, जिनका सरकार के साथ राजस्व साङीदारी समझौता है। इस समझौते के तहत ये कंपनियां, सरकारी खजाने को सालाना 20,000 करोड़ रुपये से ज्यादा देती हैं। सीएजी का ऑडिट इसकी जांच करेगा कि क्या मौजूदा समझौते के तहत सरकार का राजस्व हिस्सा उतना ही बनता है, जितना ये दूरसंचार कंपनियां दर्शाती रही हैं।

जाहिर है, निजी फर्मों के ऑडिट का अधिकार किसी भी तरह से न तो किसी निजी फर्म के काम में हस्तक्षेप माना जा सकता है और न संविधान की धारा-149 का उल्लंघन, जो सीएजी द्वारा निजी फर्मों के ऑडिट को रोकता हो। ऐसे ऑडिट से जनता को यह भी जानने को मौका मिलेगा कि कहीं दूरसंचार कंपनियां अपनी राजस्व-प्राप्ति तो घटाकर नहीं दिखा रही हैं।

इस आदेश का असर राजधानी दिल्ली की विद्युत वितरण करने वाली तीन निजी कंपनियों पर भी पड़ेगा। सीएजी से इन तीनों बिजली आपूर्ति कंपनियों का ऑडिट कराए जाने की पुकार तीन साल पुरानी है। दिल्ली की नई सरकार ने अब तीनों बिजली वितरण कंपनियों के सीएजी ऑडिट के आदेश दे भी दिए हैं। लेकिन देश में असल मुद्दा उस दरबारी पूंजीवाद को खत्म करने का है, जो सार्वजनिक हित की कीमत पर निजी कमाई की इजाजत देता है। हम तो यही उम्मीद करते हैं कि हाल के महत्वपूर्ण घटनाक्रम के बाद राजनीतिक दलों को मजबूर किया जा सकेगा कि वे दरबारी पूंजीवाद का संरक्षण बंद करें। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि सार्वजनिक संसाधनों का जनता की जिंदगी बेहतर बनाने में उपयोग हो, न कि उन्हें निजी लूट के लिए खुला छोड़ दिया जाए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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  • Web Title:सार्वजनिक संसाधनों की लूट को रोकने की राह