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न कोई ठंड से मरता है, न शर्म से

इन दिनों दो बातें साफ हो गई हैं। पहली, कोई भी ठंड से नहीं मरता और दूसरी, कोई भी शर्म से नहीं मरता। राहत कैंपों में 40 से ज्यादा बच्चों की मौत पर जब हल्ला हुआ कि वे सब ठंड से मारे गए, तो एक गृह सचिव ने मौसम विज्ञानी की हैसियत से आगे आकर भरोसा दिलाया कि कोई भी ठंड से नहीं मरता, अगर मरता, तो साइबेरिया में कोई जिंदा नहीं बचता। हालांकि वह ये बताना भूल गए कि क्या साइबेरिया के लोग भी तंबू में रहते हैं?

मगर राज्य सरकार अपने तरीके से इसके जवाब को तैयार थी। तभी तो मातमी माहौल के बीच जब बेहयाई महोत्सव हुआ। दुनिया ने देखा कि शून्य से भी कम तापमान में रूमाल-भर कपड़े पहनकर विदेशी बालाएं खुले मैदान में जमकर थिरकीं और किसी को कुछ नहीं हुआ। इसके साथ ही यह दावा भी सच साबित हो गया कि कोई भी ठंड से नहीं मरता।

मौसम विज्ञान के बाद बारी थी नैतिक विज्ञान के दूसरे दावे को सच साबित करने की। तभी तो एक तरफ सरकार ने राहत कैंपों में रह रहे विपक्षी पार्टियों के षडय़ंत्रकारियों को भगाने के लिए बुलडोजर भेजे, तो दूसरी तरफ बेहयाई महोत्सव में शिरकत के लिए फिल्मी कलाकारों के वास्ते चार्टर्ड विमान। इधर राहत कैंपों में जबरन रह रहे कुछ ढीठ लोगों पर मुकदमें ठोके, तो वहीं उन लोगों की क्लीन चिट देने की तैयारी भी हो गई, जिन पर दंगा भड़काने जैसे मामूली राजनीतिक आरोप थे। इस बेवजह की चिक-चिक के बाद राज्य के 17 विधायक और मंत्री इस चिल्ल-पों से परेशान होकर, ‘चिल’ मारने विदेशी दौरे पर चले गए हैं।

लोग कत्ल हुए, बेघर हुए, आबरू लुटी, बच्चे मरे, टेंट उजाड़े, पीड़ितों पर केस हुए और इन सबके बावजूद जिम्मेदार लोगों का जिंदा होना, नैतिक विज्ञान के उस दूसरे दावे को सच साबित करता है कि शर्म से कोई नहीं मरता। खलिल जिब्रान ने एक दफा कहा था, आओ उस इंसानियत के लिए आंसू बहाएं, जो इंसान को जन्म देने के बाद से बांझ हो गई है। सोचता हूं कि अगर रोएं भी, तब भी हुक्मरानों के दिल नहीं पसीजेंगे, क्योंकि वे जानते हैं कि ज्यादा रोने से कोई नहीं मरता।

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