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बेहतर सिनेमा का इंतजार

आज अगर बिमल राय होते, तो फिल्मी दुनिया के हालात से जरूर नाखुश मिलते। सीनियर लोगों की विरासत को जिंदा रखने में काफी हद तक नाकाम रहा है बॉलीवुड। फिल्मों के जरिये किसी के ‘टाइप ऑफ सिनेमा’ को बरकरार रखने की तरफ उसकी फिक्र दिखाई नहीं पड़ती। गुजरा वक्त यह उम्मीद रखकर चला गया कि कोई उनके जैसा काम आगे भी करेगा। बॉलीवुड ने इसे गुजारिश की तरह भी लिया होता, तो बिमल दा का सिनेमा आज की फिल्मों में बचा रहता। अफसोस यह हो न सका! फिल्में समाज से ज्यादा बाजार व कारोबार की ओर झुक गई हैं। कारोबार उस दौर में भी किया जाता था, लेकिन फिल्में महज उसी के लिए नहीं बनीं। सामाजिक उद्देश्यों की खातिर फिल्में बनाने का जुनून हुआ करता था। देश के मुस्तकबिल की बड़ी जिम्मेदारी भी सबके सामने थी। ऐसा भी नहीं कि आज का सिनेमा जिम्मेदारियों से भाग रहा है, फिर भी जो उसे करना चाहिए, वह नहीं हो पाता। सिनेमा के शताब्दी साल में भी गुजरे जमाने को एक यादगार तोहफा नहीं मिल सका। क्या इस बड़े कारखाने से कोई फिल्म उस विचारधारा को फिर से जीवित नहीं कर सकती थी? आपने पचास-साठ करोड़ रुपये बेमानी फिल्मों पर लगा दिए। इन रुपयों से पुराने जमाने की बेहतरीन फिल्मों का रिमेक हो न सका। बिमल राय सरीखे महान फिल्मकारों की फिल्में इतिहास के दायरे में रहने को मजबूर हैं। आज की फिल्मों पर दूसरे सिनेमा का असर जरूर है, लेकिन अपने ही पास का एक बेहतर सिनेमा इंतजार देखता है।
जानकी पुल में सैयद एस तौहीद

 

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