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इंटरनेट और बच्चे

वे देश के भविष्य हैं। वे ही संसार को दशा-दिशा देंगे। वे बच्चे हैं और हमारे कल को बेहतर बनाएंगे। लेकिन बीते मंगलवार को जो बाल क्रूरता रोकथाम दिवस मनाया गया, उस दिन यह जानना वाकई भयावह था कि बच्चों के अबोध मस्तिष्क को भ्रष्ट करने के कई रास्ते खुले हुए हैं और जिनसे बाल-मन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। पहले हम अपराधियों व बाल-तस्करों द्वारा बच्चों पर क्रूर हमले या उनके शोषण की घटनाएं सुनते थे। कभी-कभार परिवार में बाल-शोषण के मामले आते थे। लेकिन बीते हफ्ते सीएनएन टेलीविजन पर एक नामचीन उपन्यासकार और फिल्मकार ने यह बताया कि कैसे नई सूचना व संचार तकनीक के गलत इस्तेमाल से पश्चिमी देशों में 80 प्रतिशत किशोर वय के बच्चे नैतिक और मानसिक रूप से भ्रष्ट होते हैं। यह एक खतरनाक संकेत है। श्रीलंका भी इससे अछूता नहीं है। पीढ़ियों से बच्चों को सेक्स-शिक्षा माता-पिता, स्कूल के शिक्षक और समाज के बड़े-बुजुर्ग देते आए हैं। यह जरूरी होता है, क्योंकि दस साल की उम्र से बच्चों में हॉर्मोन संबंधी बदलाव आने लगते हैं। यदि उन्हें इन बदलावों से जुड़ी सही जानकारियां न दी जाएं, तो वे इन्हें गलत तरीके से सीखेंगे और इससे उनकी जिंदगी, उनके परिवार और समाज पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा। सीएनएन के विश्लेषक यह खुलासा कर हमें चौंका जाते हैं कि पश्चिम में 80 फीसदी बच्चे सेक्स की जानकारी अपने माता-पिता, स्कूल या किसी जिम्मेदार संस्था से नहीं, बल्कि अश्लील और घटिया वेबसाइटों से पाते हैं। शुरू में, जब यह प्रवृत्ति कंप्यूटर से फैल रही थी, तब इसे रोकना आसान था और माता-पिता इन वेबसाइटों को बंद करा देते थे। लेकिन जैसी खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक अब बच्चे इस लत की गिरफ्त में हैं, क्योंकि ये अश्लील साइटें स्मार्टफोन पर भी उपलब्ध हैं। श्रीलंका भी इस मामले में हैरत में है कि हाल ही में यह पता चला है कि की-बोर्ड से सबसे अधिक लिखे जाने वाले शब्दों में से एक ‘सेक्स’ है। यह भी बताया जा रहा है कि यौन-हिंसा जैसे अपराध इस देश में काफी बढ़े हैं। अगर हम अपने बच्चों के भविष्य को बचाना चाहते हैं, तो एक देश के तौर पर इसे रोकना होगा।
द डेली मिरर, श्रीलंका

 

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