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उचाड़ रहा सारंडा फेल हुईं योजनाएं

हाार 882 हेक्टयेर में फैला एशिया का सबसे बड़ा जंगल सारंडा लगातार उाड़ रहा है। इसकी हिफाजत के लिए समय-समय पर बनीं सरकारी योजनाएं फाइलों में दफन होकर रह गयीं। एक्स आर्मीमेन की तैनाती से लेकर वृक्षारोपण तक के प्रस्ताव धूल फांक रहे हैं। 21 नवंबर 2002 को तत्कालीन सीएम बाबूलाल मरांडी ने सारंडा जंगल की सुरक्षा और इसके उन्नयन को लेकर उच्चस्तरीय बैठक की थी। इसमें पांच साल के लिए योजना बनी थी। 20 करोड़ की लागत से वन क्षेत्र में नये पौधे लगाये जाने थे। पांच साल बीत गये, नतीजा ढाक के तीन पात रहा।ड्ढr न एक्स आर्मीमेन तैनात हुए, न एसएलआर मिलेड्ढr अविभाजित बिहार में ही राज्य के जंगलों की सुरक्षा के लिए 507 सेल्फ लोडिंग रायफल (एसएलआर) खरीदने का निर्णय लिया गया था। इसके लिए आयुध कारखाने को पूरी राशि का भुगतान कर दिया गया। इस बीच राज्य का बंटवारा हुआ। तय हुआ कि झारखंड को 370 और बिहार के हिस्से में 137 राइफल मिलेंगे। फैक्टरी से हथियार की आपूर्ति होती, इसके पहले केंद्र ने यह शर्त रखी कि जिन जवानों को हथियार दिये जायेंगे, उन्हें पूरी तरह प्रशिक्षित किया जाये। इसके बाद झारखंड के वन विभाग ने 370 एक्स आर्मीमैन की नियुक्ित करने का प्रस्ताव तैयार किया। इन जवानों को प्रशिक्षण देने के लिए हाारीबाग स्थित पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज को साढ़े लाख का भुगतान कर दिया गया। तीन महीने के प्रशिक्षण के बाद जवानों को हथियार सौंपे जाने की योजना थी, लेकिन पेंच एसी लगी कि एक्स आर्मीमैन की नियुक्ित नहीं हो सकी।ड्ढr पीसीसीएफ बोले, कई कारण हैं विफलता केड्ढr पीसीसीएफ सीआर सहाय मानते हैं कि सारंडा की सुरक्षा के लिए बनीं योजनाएं विफल रहीं हैं। इसके कई कारण हैं। पूरा जंगल उग्रवाद प्रभावित हो गया है। एमसीसी का केंद्र बन गया है। उग्रवादियों ने वन विभाग के सभी गेस्ट हाउस उड़ा दिये। अब यहां न तो वन अधिकारियों के लिए ठहरने की जगह बची है और न ही सुरक्षाकर्मियों के लिए।

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