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राजनीति के रिवर्स गेयर में दल और उनके नेता

पढ़े-लिखे लोग बताते हैं कि मार्क्सवाद जो है, वह ऐतिहासिक भौतिकवाद को मानने वाला दर्शन है। बाकी दुनिया का पता नहीं, पर भारत के मार्क्सवादी ऐतिहासिक भी हैं और भौतिकवादी भी। वे अक्सर डरावनी फिल्मों के चरित्र नजर आते हैं, जिनमें सैकड़ों साल पुराने लोगों की आत्माओं की आवाजें खंडहरों में गूंजती हैं। लेकिन उन्हें क्यों दोष दें? भारत में सब कुछ ऐतिहासिक है। संघ परिवार वाले तो इतने ऐतिहासिक हैं कि प्रागैतिहासिक होते-होते रह गए। उनके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी जब इतिहास की गलियों में घूमते हैं, तो अक्सर ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं। फिलहाल वह इतिहास-बोध के राणा सांगा बने हुए अपना प्रचार कर रहे हैं। उधर वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अभी से घोषणा कर डाली है कि वह इतिहास में अपनी जगह बुक करवा रहे हैं। उनके साथ सभी कांग्रेसियों में इतिहास बनने की ऐसी ललक पैदा हुई है कि वे वर्तमान में अपना नामो-निशान मिटाने की कोशिश कर रहे हैं।

हालत यह है कि अब कोई वर्तमान में रहने को तैयार नहीं। वर्तमान में अपना खाता बंद करके इतिहास की पासबुक खोलने की ऐसी ललक राजनेताओं में क्यों पैदा हो गई है? किसी के पास कोई नई दृष्टि नहीं, नया विचार नहीं। पूरा देश टीवी पर आने वाले किसी ऐतिहासिक सीरियल की तरह दिख रहा है। पहले भी नेता भ्रष्टाचार करते थे, लेकिन ऐसा क्या कि जितना मुमकिन हो, उतना पैसा जुटाकर अपना ही स्मारक बनवाने में जुट जाएं कि हमारे खानदान के चिराग टिकट लगाकर पर्यटकों के जरिये रोजी-रोटी कमाएंगे। उत्तर से दक्षिण तक सारे राजवंश राष्ट्रीय धरोहरों की सूची में नाम डलवाने में जुटे हैं, जैसे उन्होंने वर्तमान सफेद टोपी वाले ‘आप’ को सौंप दिया हो। जब राजनीति का मकसद सिमटकर अपना, अपने परिवार का और अपने दरबारियों का हित साधने तक रह जाता है, तो फिर वर्तमान और भविष्य नहीं बचता। अगर भावी सात पीढ़ियों के लिए दौलत कमाना ही उद्देश्य हो, तो अपना इतिहास बनना जरूरी है। क्या जमाना आ गया है, देश आगे की ओर बढ़ रहा है, और राजनीति में सिर्फ रिवर्स गियर बचा है।

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