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भय का फलसफा

शायद ही कोई इंसान हो, जो कभी भयभीत न हुआ हो। अन्य भावनाओं की तरह इसका भी होना जरूरी है। लेकिन कितना? इतना तो नहीं ही कि हमें जहां अपनी बात रखनी हो, रख न पाएं। जो करना हो, कर न पाएं। इतना तो नहीं ही कि हमारे विचारों पर इसकी छाया पड़ने लगे। कदम आगे बढ़ाने के बारे में सोचने से पहले उसे पीछे खींच लें। भय दरअसल आपको वर्तमान का आनंद नहीं लेने देता। यह भविष्य को लेकर बेजा चेतावनी देता रहता है। और हम अपने खोल में दुबक जाते हैं। न्यूरो साइकियाट्रिस्ट वीएस पॉल ने भय पर काफी शोध किया है। वह कहते हैं कि इंसान और कॉक्रोच, दो चीजें भगवान ने ऐसी बनाई हैं, जो किसी भी परिस्थिति में रहना सीख जाते हैं। जब ऐसा है, तो हम किसी अनहोनी के लिए क्यों भयभीत हों? हम तो जो होगा, उसमें रम ही जाएंगे। और होगा भी क्या? वही न, जो होना है। उससे तो हम निपट ही सकते हैं। महान दार्शनिक और कवि रॉल्फ वाल्डो इमर्सन ने इस बारे में एक खूबसूरत बात कही है। वह कहते हैं कि आप जिस काम से भयभीत हों, उसे कर दें, भय की मौत तय है।

इमर्सन ने जो कहा, उसके मनोवैज्ञानिक पहलू हैं। अवचेतन मन का एक प्रमुख नियम है कि वही विचार साकार होते हैं, जिन पर हमारा सबसे अधिक ध्यान होता है। जब हम असफलता पर ज्यादा फोकस्ड होते हैं, तो अवचेतन मन उसे साकार कर देता है। हमारे ज्यादातर भय असामान्य होते हैं। और ऐसा तब होता है, जब हम अपनी कल्पनाओं को बेकाबू होने देते हैं। मशहूर उद्योगपति वारेन बफेट ने कहा है कि बड़े भय भी वैसे ही होते हैं, जैसे छोटे भय। कारोबार में नुकसान का भय भी वैसा ही है, जैसा बच्चों का भूत से भयभीत होना। दोनों चीजें महज आभासी हैं और इनका कोई अस्तित्व नहीं। अंत में शेखर एक जीवनी  उपन्यास में लिखी अज्ञेय की एक पंक्ति याद को रखें-‘डर डरने से होता है।’

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