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मारे जा रहे हैं बाघ

पिछले सात वर्षों के दौरान कभी किसी एक साल में इतने बाघ शिकारियों के हाथों नहीं मारे गए थे। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसायटी ऑफ इंडिया (डब्ल्यूपीएसआई) और नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी की ओर से जारी ताजा आंकड़ों में इसका खुलासा हुआ है। भारत में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की ओर से कहा गया है कि वर्ष 2013 के दौरान कुल 63 बाघों की मौतें हुईं। इनमें से कुछ तो सड़क हादसों और बीमारियों की वजह से मर गए, लेकिन 48 बाघ शिकारियों के हाथों मारे गए। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसायटी ऑफ इंडिया ने इस दौरान शिकारियों के हाथों 42 बाघों के मारे जाने की बात कही है, पर साथ ही उसका कहना है कि पिछले सात वर्षों में कभी किसी एक वर्ष के दौरान इतने बाघ शिकारियों के हत्थे नहीं चढ़े थे। सोसायटी ने इस दौरान शिकार समेत विभिन्न वजहों से कुल 76 बाघों के मरने की बात कही है।

आखिर तमाम उपायों के बावजूद बाघों के शिकार पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? दरअसल, पड़ोसी चीन में बाघ के शरीर के विभिन्न हिस्सों की लगातार मांग बढ़ रही है। वहां इससे पारंपरिक दवाएं बनाई जाती हैं। डब्ल्यूपीएसआई की भारत प्रमुख बेलिंडा राइट कहती हैं, ‘जब तक चीन में इस मांग पर अंकुश नहीं लगता, तब तक बाघों के शिकार पर अंकुश लगाना मुश्किल है। लेकिन यह काम चीन ही कर सकता है।’ वन्य-जीवों के संरक्षण में जुटे कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार को महज आंकड़े जुटाने की बजाय संरक्षण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
डायचे वेले में प्रभाकर

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