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विचार और हिंसा

आम आदमी पार्टी के दफ्तर पर हमला करने वाले लोग ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा पाए, उन्होंने कुछ गमले तोड़े और पोस्टर फाड़े, सौभाग्य से किसी व्यक्ति को कोई चोट नहीं पहुंची। ऐसे लोगों की मंशा भी यही होती है कि कुछ हंगामा पैदा हो और चर्चा मिल जाए। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक समाज में ये लोग एक बदनुमा दाग होते हैं। जिस संस्था ‘हिंदू रक्षा दल’ के ये सदस्य बताए जाते हैं, उसका नाम शायद ही किसी ने सुना हो और हो सकता है कि यह कोई औपचारिक संगठन न हो। यह भी मुमकिन है कि उसके सदस्य भी उतने ही हों, जितने ‘आप’ के दफ्तर पर हमला करने आए हों। हर समाज में ऐसे लोग होते हैं, जो किसी तरह प्रचार पाना चाहते हैं या अपने को महत्वपूर्ण साबित करना चाहते हैं। लेकिन इसके लिए अगर दूसरों को या लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान पहुंचाया जाए, तो इसे कतई ठीक नहीं कहा जा सकता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है और यह जरूरी है कि विचार का जवाब विचार से ही दिया जाए।

अगर किसी विचार के जवाब में हिंसा का सहारा लेना जायज हो जाए, तो अंत में सिर्फ हिंसा ही बचेगी, विचार नहीं। इसलिए ‘आप’ के दफ्तर पर हुए हमले की सख्त शब्दों में आलोचना की जानी चाहिए। हिंसा करने वाले लोग ‘आप’ के नेता और मशहूर वकील प्रशांत भूषण के कश्मीर पर बयान का विरोध कर रहे थे। प्रशांत भूषण ने कहा था कि कश्मीर में सेना की मौजूदगी पर घाटी में जनमत संग्रह करवाया जाना चाहिए और अगर बहुसंख्यक लोग सेना की वापसी चाहते हों, तो उसे वापस हो जाना चाहिए। प्रशांत भूषण का आज से नहीं, बल्कि कई साल से कश्मीर के मामले में एक रवैया है और उससे सहमत या असहमत होना एक अलग मुद्दा है, लेकिन वह कोई ऐसी बात नहीं है, जिसे कहना भी कोई अपराध हो।

कश्मीर में भारत सरकार की नीति और कामकाज की आलोचना करने वाले लोग भारत में बहुत सारे हैं। प्रशांत भूषण कई मानवाधिकार समूहों के साथ मिलकर कश्मीर के मुद्दे पर सक्रिय हैं। उनसे असहमत लोग भारत में ज्यादा होंगे और उनकी पार्टी ‘आप’ ने ही उनके बयान से असहमति दर्शाई है। प्रशांत भूषण की इस मामले में आलोचना सिर्फ इस आधार पर की जा सकती है कि एक राजनीतिक पार्टी के जिम्मेदार सदस्य होते हुए उन्हें किसी विवादास्पद मुद्दे पर बोलते हुए सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि उनके निजी विचारों को उनकी पार्टी का आधिकारिक विचार माना जा सकता है। लेकिन यह समस्या ‘आप’ के साथ आम है कि अब तक उसके नेता उग्र आंदोलनकारियों वाले अंदाज में बयानबाजी करते हैं और फिर फंस जाते हैं।

इसके लिए शायद यह भी जरूरी है कि देश के बड़े मुद्दों पर ‘आप’ में विचारमंथन हो और वह अपनी राय कायम करे। राजनीति या सार्वजनिक जीवन में हिंसा का इस्तेमाल इसलिए ज्यादा होता है, क्योंकि इसका विरोध अक्सर औपचारिकता निभाने के लिए होता है या राजनीतिक विरोध के लिए होता है। दक्षिणपंथी गुटों की हिंसा का विरोध वामपंथी करते हैं और वामपंथी हिंसा का विरोध दक्षिणपंथी करते हैं। बुनियादी तौर पर जरूरी यह है कि सार्वजनिक जीवन में हिंसा को ही गलत कहा जाए, भले ही उसका घोषित उद्देश्य जो भी हो, क्योंकि हिंसा लोकतंत्र में विचार के प्रभाव को कमजोर करती है। कश्मीर के नाम पर देश में तोड़फोड़ करने वाले और उग्र बयानबाजी करने वाले लोग समझते नहीं हैं, न समझना चाहते हैं कि वे कश्मीर मुद्दे पर भारत का पक्ष कमजोर करते हैं। शायद यही सच है कि इन लोगों के पास कोई मुद्दा नहीं है, वे सिर्फ सनसनी फैलाना चाहते हैं। जरूरी यह है कि इन्हें नाकाम किया जाए।

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  • Web Title:विचार और हिंसा