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ठिठुर रहा है अमेरिका

अब तक यही पता है कि ध्रुवीय बवंडर वस्तुत: आर्कटिक क्षेत्र के ऊपर टिकी बेहद ठंडी हवाओं का चक्रवात होता है। इस बार इस चक्रवात को शरारत सूझी और वह दक्षिण की ओर चल पड़ा। इस तरह, बीते मंगलवार को न्यूयॉर्क में 118 साल की सबसे भयंकर सर्दी पड़ी। तापमान शून्य से काफी नीचे चला गया था। अन्य अमेरिकी और कनाडाई शहरों में भी सर्दी के पुराने कीर्तिमान टूट गए हैं। पूरे उत्तरी अमेरिका के ऊपर विमानों ने उड़ानें भरनी बंद कर दी हैं। वैसे, सर्दी ने अभी अंगड़ाई ही ली है, फिर भी इस हफ्ते की हाड़-मांस गला देने वाली सर्दी से पहले पूर्वी अमेरिका में बर्फानी तूफान का प्रकोप था, दक्षिण-पूर्वी ब्रिटेन में भी शीत लहर बह रही थी और उत्तरी यूरोप में भी मौसम अचानक असामान्य हो चला है। मौसम का मिजाज जिस तेजी से बदल रहा है, उसे न तो भांपा जा सकता है और न ही समझा।

इससे पहले मार्च 1921 में ध्रुवीय बवंडर का पागलपन दिखा था। तब 14 घंटे के अंदर तापमान में 50 डिग्री से भी अधिक की गिरावट आ गई थी। जानकारों का कहना है कि इस हफ्ते जो ध्रुवीय बवंडर का असर दिखा है, वह ग्रीनलैंड और अलास्का के ऊपर गरम हवाओं के ठहरने का नतीजा हो सकता है। वहीं कुछ इस ओर भी इशारा कर रहे हैं कि ध्रुवीय तूफानों का अचानक आना हाल के वर्षों की सामान्य घटना है। ब्रिटेन के मौसम विज्ञानी बता रहे हैं कि वहां पर अक्तूबर महीने से जो चक्रवात रह-रह आ रहे हैं, वे सहारा की गरम हवाओं के नतीजे हो सकते हैं, जो उत्तरी अटलांटिक के ऊपर फंसी हुई हैं।

तमाम मौसम-विज्ञानी इसी तथ्य पर जोर डालते हैं कि सदी में एकाध बार असामान्य जलवायु पैदा होने की घटना अब तेजी से घट रही है और इसका असर पहले की तुलना में बढ़ता ही जा रहा है। यकीनन, जलवायु परिवर्तन का खतरा वास्तविक है और हमारी सरकारों को विषम मौसमों के दुष्प्रभावों और नुकसानों के लिए तैयार रहना चाहिए। सामान्य समझ तो यही कहती है कि खतरे के उन कारकों पर वास्तविक हमला हो, जो आने वाले समय में चीजों को मुश्किल बना देंगे।  
द न्यूयॉर्क टाइम्स, अमेरिका

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