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पारदर्शी बने पार्टियां

हमारे देश में राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे में आना चाहिए। इस प्रकार से कुछ समय पहले भारत के गृह मंत्री ने कहा था कि आम आदमी पार्टी को विदेश से चंदा मिलने की शिकायतें आ रही हैं, जिनकी जांच होगी। इसका आम आदमी पार्टी ने भी स्वागत किया था। इसी तरह से सूचना आयोग ने अपने एक आदेश में राजनीतिक दलों के सचूना के अधिकार के दायरे में आना चाहिए। इस विषय को लेकर राजनीतिक दलों में उबाल आ गया और इसके विरोध में वे एक साथ उठ खड़े हुए। लेकिन राजनीतिक दलों ने जिस तरह अकूत धन-राशि एकत्र की है, उसमें पारदर्शिता न होने के कारण भ्रष्टाचार की बदबू आती है। इसे दूर किया जाना जरूरी है। यदि चुनाव सुधार की बात हम करते हैं, तो राजनीतिक दलों को अपने अंदर शुचिता और पारदर्शिता लानी होगी और इसके लिए उन्हें अपने चुनावी कोष की जानकारी को सार्वजनिक करना ही होगा।
शरद चंद्र झा, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

संपर्क और परिवहन

अब भी देश के दूर-दराज के इलाकों में न तो मोबाइल फोन पहुंचा है और न ही उन इलाकों में सड़कें बनी हैं। ऐसे में, यह साफ होता है कि दूर-दराज के इलाके देश की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पा रहे हैं। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और पेयजल से जुड़ी समस्या आएंगी ही। शासन को पंचायत स्तर तक पहुंचाने के लिए संपर्क और परिवहन, दोनों की व्यवस्था आवश्यक है। हर गांव तक सड़क पहुंचे और हर इंसान के पास मोबाइल हो, यही आधुनिक भारत का सपना है।
राज, बोधगया, बिहार

आधार की विफलता

देश में आधार कार्ड बनाने का काम प्राइवेट संस्था को दिया गया, लेकिन इसकी निगरानी का कोई उपाय नहीं किया गया। यह इस योजना की मुख्य विफलता थी। प्राइवेट संस्था ने जो कार्ड बनाएं, अब उनमें कई खामियां सामने आ रही हैं। इसके अलावा, कार्ड के वितरण से जुड़ी गड़बड़ियां भी प्रकाश में आई हैं। प्राइवेट संस्था, जिनका कार्ड बनाते हैं, उन्हें मोबाइल पर सूचित करते हैं कि आपका कार्ड बन चुका है, कृपया कंप्यूटर से इसकी एक प्रति निकाल लें। यह पूरी प्रक्रिया काफी जटिल है, जो आम लोगों के बस के बाहर की है। हर के पास यह सुविधा नहीं होती कि बाजार से प्रिंट आउट निकाल ले। एक सवाल यह भी है कि डाउन लोड आधार कार्ड मुख्य आधार कार्ड के समतुल्य कैसे हुआ, दोनों के पेपर में अंतर जो होता है? दरअसल, प्राइवेट संस्थान आधार कार्ड वितरण के पैसे बचा रही है। देश में अभी काफी लोग अपने आधार कार्ड का इंतजार कर रहे हैं और यह योजना अपनी शुरुआत में ही विफल साबित होने लगी है। यह दुर्भाग्य की बात है।
हृदयेश कुमार, सेक्टर-45, गुड़गांव

दागदार खाकी

बीते दिनों दो ऐसी घटनाएं घटीं, जिनसे यह पता चला कि तमाम प्रयासों और आलोचनाओं के बाद भी पुलिसकर्मी अपने दायित्व के प्रति लापरवाह ही नहीं, बल्कि आपराधिक घटनाओं में बराबर के कसूरवार हैं। एक खबर यह थी कि सबूत मिटाने के लिए पीड़ित को जिंदा जला दिया गया और दूसरी खबर थी कि कुछ पुलिसकर्मियों ने ही एक लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। अगर रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो फिर देश का क्या होगा? शायद यही कारण था कि पहले महिलाएं या कमजोर तबकों के लोग तमाम यातनाओं को सहकर भी पुलिस थाने एफआईआर दर्ज करवाने नहीं जाते थे। होता यह था कि पुलिस के जरिये पीड़ित पक्षों पर केस वापस लेने के लिए दबाव बनाया जाता था और लोग थक-हारकर केस वापस ले लेते थे। लेकिन हाल के वर्षों में कानून भी कड़े हुए, लोगों में जागरूकता भी आई और सूचना-क्रांति ने सब कुछ सुगम और सहज बना दिया। सब बदल गए, लेकिन पुलिस-व्यवस्था नहीं बदली है। इसलिए तो खाकी वर्दी दागदार होती रहती है।
टीसीडी गाडेगावलिया, करोल बाग, नई दिल्ली 

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