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राजनयिक संकट: कब टूटेगा गतिरोध

देवयानी मामले के चलते भारत-अमेरिका के रिश्ते में थोड़ी खटास सी दिख रही है। हालांकि ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि किसी एक मामले का असर भविष्य में भारत-अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी पर नहीं पड़ेगा। बता रहे हैं जयंत जैकब

इतिहास के पन्ने पलट कर देखते हैं। 1967 में कृष्णन रघुनाथ, बीजिंग में भारत के दूसरे सचिव, जो बाद में भारत के विदेश सचिव बनें, को माओ की लाल सेना द्वारा निर्दयतापूर्वक पीटा गया था। उन पर आरोप था संवेदनशील मिलिट्री क्षेत्र की फोटोग्राफी का। इस घटना से देश में जबरदस्त आक्रोश पनपा और भारत ने भी जोरदार विरोध दर्ज कराया। लेकिन इसके बावजूद लाल सेना पर चीन सरकार नियंत्रण न रख सकी और उसने दूसरे देशों के राजनयिकों को भी निशाना बनाया। 46 साल बाद, ऐसी ही एक घटना फिर घटी है, जिसको लेकर देश में जबरदस्त आक्रोश है। मामला भारत की डिप्टी कौंसुल जेनरल देवयानी खोबरागड़े, न्यूयॉर्क का है। इन्हें हिरासत में लिया गया और इनके साथ असम्माननीय व्यवहार किया गया। इनके ऊपर आरोप है कि इन्होंने वीजा फ्रॉड किया और अपनी नौकरानी को कम पैसे दे रही थीं।

खोबरागड़े घटना ने निश्चित रूप से रघुनाथ की याद दिला दी। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस पर कड़ा प्रतिवाद जताया। भारतीय विदेश मंत्रालय इस बात पर आक्रोशित था कि उसे देवयानी की गिरफ्तारी से पहले सूचना क्यों नहीं दी गई, साथ ही नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास ने इस मामले में भारत को विश्वास में कयों नहीं लिया। ये आक्रोश जार्ज डब्लू बुश के कार्यकाल से शुरू हुए और बराक ओबामा के पहले कार्यकाल से चले आ रहे अच्छे संबंधों के लिए शुभ संकेत नहीं है। पूर्व विदेश सचिव निरूपमा राव, जिनका अमेरिका में बतौर राजदूत कार्यकाल हाल ही में समाप्त हुआ है, ने ट्वीट किया, ‘अगर अमेरिका इस पूरे मामले को रूटीन की तरह लेता है तो यह दोनों देशों के बीच चल रही रणनीतिक साझीदारी के लिए यह अच्छा नहीं होगा।’

संयोग से खोबरागड़े के दलित होने की वजह से भारत में इस मुद्दे ने एक अलग ही राजनैतिक रंग ले लिया। तो क्या इस घटना की वजह से भारत-अमेरिकी संबंधों पर काली छाया पड़ गई है? दिसम्बर 2010 में भारतीय संसद के संयुक्त सदन को संबोधित करते हुए बराक ओबामा, अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जिन्होंने अपने पहले ही कार्यकाल में भारत का दौरा किया था, कहा था- ‘मेरा दृढ़ विश्वास है कि अमेरिका-भारत के बीच संबंध हमारे साझा हितों और साझा मूल्यों से बंधे हैं और 21वीं सदी में हमारी साझीदारी निर्णायक साझीदारियों में से एक होगी।’ हालांकि इस घटना के बाद संबंधों में पुरानी गर्मजोशी खत्म हो रही है।

अमेरिका को भारत द्वारा नाभिकीय दायित्व निभाने में दोष दिखने लगा है। उसका यही विश्वास भारत के साथ परमाणु व्यापार के रास्ते में आ सकता है। अमेरिका की यह भी शिकायत है कि भारत के साथ की गई रक्षा साझीदारी उनकी रणनीतिक साझीदारी के उम्मीदों पर खरा नहीं उतरी है। इस देश ने भारत के बौद्धिक संपदा शासन पर भी आपत्ति जताई है। भारतीयों को भी लग रहा है कि यह रणनीतिक साझीदार भारत के पड़ोसी देशों के मुद्दों पर उससे अलग जा रहा है। जैसे अफगानिस्तान में तालिबान से शांति वार्ता और बांग्लादेश में अमेरिका द्वारा अधिक सक्रियता दिखाना आदि।

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ओबामा के पहले कार्यकाल के पहले राजकीय अतिथि थे। बदलते रिश्तों की बात का इससे भी पता चलता है कि जब पिछले साल सितम्बर में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिका गए तो ओबामा से उनकी आधिकारिक मुलाकात 20 मिनट से भी कम अवधि की रही और उपराष्ट्रपति जो बीडेन ने उनके साथ लंच की मेजबानी की। रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी कहते हैं, ‘इस वक्त ध्यान चाहे भारतीय राजनयिक से जुड़े प्रकरण पर हो, लेकिन यह कह कर असल मुद्दे से हम अपना ध्यान ही हटाएंगे। असल मुद्दा है अमेरिका द्वारा भारत को गंभीरता से न लेना। वह यह भी कहते हैं, ‘लेकिन बात तभी बनेगी, जब अमेरिका भारत को दयाभाव से लेना बंद करे और उसके साथ बराबर के एक रणनीतिक साझीदार की तरह व्यवहार करे।’ पूर्व करियर राजनयिक और टिप्पणीकार एमके भद्र कुमार चेतावनी देते हुए कहते हैं, ‘सच में अमेरिका भारत के साथ बराबरी का व्यवहार करे, यह अलग मुद्दा है। हमें यहां थोड़ा यथार्थवादी होना पड़ेगा। हो सकता है कि अमेरिका की शक्ति कम हुई हो, लेकिन वह अब भी बहुत शक्तिशाली है।

इसलिए भारत को अमेरिका से अलग नीति का पालन करना चाहिए और खुद को आगे बढ़ाना चाहिए।’ पूर्व विदेश सचिव और भारत-अमेरिका नाभिकीय सौदा में अहम भूमिका निभाने वाले श्याम शरण कहते हैं, ‘ दोनों देशों को बराबर की जरूरतों और दिलचस्पी पर बात करनी चाहिए और मतभेद वाले मुद्दे छोड़ देने चाहिए।’ शुक्रवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि कूटनीतिक गतिरोध को दूर करने का एक और मौका दिया जाना चाहिए। फिलहाल हम तात्कालिक गतिरोध का सामना कर रहे हैं। हालांकि वह यह भी स्वीकार करते हैं कि यह रास्ता देवयानी मुद्दा सुलझाने के रास्ते ही हो कर गुजरेगा। अमेरिका में भारत के पूर्व स्थायी प्रतिनिधि हरदीप पुरी कहते हैं, ‘देवयानी मामला कोई साधारण घटना नहीं है। इसलिए इस मुद्दे पर बातचीत के रास्ते गतिरोध तोड़ना चाहिए।’भद्रक कुमार जैसे विदेशी मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में सबकुछ ठीक हो जाएगा, क्योंकि किसी एक घटना का असर दोनों देशों के रिश्ते पर नहीं पड़ेगा। यह सुनिश्चित करने के लिए प्रयास जारी रखने चाहिए। हमें यह याद रखना चाहिए कि शीत युद्ध की तरह का समय अब न शुरू हो।

विशेषज्ञों ने कहा
नैंसी पॉवेल, भारत में अमेरिकी राजदूत

मैं भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस वक्तव्य का स्वागत करता हूं, जिसमें उन्होंने हमारे दो देशों के बीच रणनीतिक गठबंधन को मजबूत करने की बात को सर्वोच्च प्राथमिकता में रखा है। हम भविष्य में बढ़ती असैन्य परमाणु सहयोग समेत रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी, व्यापार और निवेश के लिए तत्पर हैं। अफगानिस्तान जैसे कई अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दे जैसे कानून प्रवर्तन, आतंकवाद आदि पर सहयोग की संभावनाएं देख रहा हूं। हम दोनों तरफ से पढ़ाई, व्यवसाय तथा दूसरे नागरिक मसलों पर ज्यादा आवा-जाही को प्रोत्साहित कर रहे हैं।

मैं भारत में लगभग 34 साल बीता चुका हूं और यहां हर क्षण का लुत्फ उठाया है। मैं आगे की देख रहा हूं, 2014 में हम कई क्षेत्रों में एक शानदार साझीदारी निभा कर दोनों देशों को मजबूत बना सकते हैं। आप सबको नया साल मुबारक।

ललित मान सिंह
पूर्व विदेश सचिव तथा अमेरिका में पूर्व भारतीय राजदूत

यदि हम एक ही मुद्दे पर ज्यादा ध्यान देने लगते हैं तो इसका असर रिश्ते में दिखने लगता है। हमारी रणनीतिक साङीदारी एक समस्या की वजह से प्रभावित हो रही है। देवयानी खोबरागड़े का मामला एक मसला है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। भारत-अमेरिका का संबंध बहुआयामी है और यह बहुत व्यापक है। यह एक स्थायी साझीदारी है। हालांकि मैं यहां यह भी कहना चाहूंगा कि रिश्ते के संकट की बात जो कही जा रही है यह महज एक धारणा है। जब अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज डब्लू बुश थे, तब भी बहुत सारी बातें कही गई थी, लेकिन वह इस बात पर सहमत थे कि उनके लिए भारत बहुत अहम साझीदार है। ओबामा भी ऐसा ही सोचते हैं। हालांकि हालिया समय में भारत और अमेरिका दोनों घरेलू मोर्चो पर बहुत व्यस्त हैं। इसके बावजूद ओबामा रिश्ते को आगे लेकर गए हैं। ओबामा ने भारत-अमेरिका रिश्ते के प्रति प्रतिबद्धता जताई है और इसका विस्तार किया है। अब जब भारत में आम चुनाव होने वाले हैं, सभी देश इस इंतजार में है कि कौन सा दल सत्ता में आता है।


देवयानी डायरी

2012 अगस्त:
देवयानी खोबरागड़े ने संगीता रिचर्ड को अपने घरेलू सहायक के रूप में रखा। वह उन्हें भारत से लेकर गईं। उस वक्त वह विदेश मंत्रालय में डायरेक्टर  (कौंसुलर, पासपोर्ट और वीजा) थीं। दिल्ली में संगीता का वेतन 25000 रुपये और अगर जरूरत पड़ी तो ओवर टाइम का लगभग 5000 रुपये दिया जाएगा। इस राशि 30000 रुपये को ‘मूल वेतन’ के रूप में दिखाया गया।

2012 सितम्बर: देवयानी ने एक सहायक के रूप में संगीता रिचर्ड को आधिकारिक भारतीय पासपोर्ट दिलवाया।

2012, 15 अक्तूबर: देवयानी ने संगीता की तरफ से यह अनुरोध किया कि संगीता कम्प्यूटर नहीं चला सकती, इसलिए इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म डीएस-160 भरने में उन्हें मदद करने दी जाए। इस फॉर्म में देवयानी और संगीता के द्वारा नियोक्ता द्वारा दी जाने वाली वेतन संबंधी जानकारी वाले बॉक्स में 4500 डॉलर भरा गया।

2012, 11 नवम्बर: देवयानी और संगीता ने राज्य विभाग द्वारा दिये गए रोजगार कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर किये, जिसमें संगीता को प्रत्येक घंटे का वेतन 9.75 डॉलर गारंटी दी गई। साथ इसमें कुछ लाभ के संकेत भी दिये गए। इसमें यह भी भरा गया था कि किसी तरह की नाजायज कटौती नहीं की जाएगी। इसमें औसतन प्रत्येक सप्ताह काम के 40 घंटे दिखाए गए (अर्थात महीने का वेतन 1560 डॉलर) और अमेरिकी राज्य विभाग द्वारा ए-3 वीजा के लिए जरूरी ऑफ के दिन भी निर्धारित कर दिये गए।

2012,नवम्बर: देवयानी से संगीता ने अनुरोध किया कि उसका ‘मूल वेतन’ 30000 रुपये मासिक उसके दिल्ली स्थित बैंक अकाउंट में जमा कराना जारी रखा जाए।

2012, 23 नवम्बर: भारतीय आधारित कॉन्ट्रैक्ट में देवयानी संगीता को भारत में 30000 रुपये दे रही थीं।
2012, 24 नवम्बर: संगीता की डिप्टी कौंसुलर जेनरल, न्यूयॉर्क के यहां आधिकारिक नौकरी शुरू।
24 नवम्बर 2012 से 22 जून 2013: संगीता का 11 नवंबर 2012 के अनुबंध शर्तों के अनुसार काम के वास्तविक घंटों का भुगतान किया गया। संगीता के औसतन काम के घंटे सप्ताह में 40 घंटे से ज्यादा नहीं थे। उसने अनुबंध के लिहाज से सिक लीव, छुट्टियां और ऑफ डे लिये। उसे हफ्ते के 40 घंटे के लिए 9.75 डॉलर प्रत्येक घंटे के हिसाब से भुगतान किया गया। संगीता को महीने के 1560 डॉलर का भुगतान किया गया। भारत में लगभग 560 डॉलर (30000 रुपये महीना) और 1000 डॉलर न्यूयॉर्क में।
2013, 24 जून: न्यूयॉर्क स्थित विदेशी मिशन कार्यालय ने संगीता के गायब होने की सूचना दी।
2013, 3 जुलाई: भारत का कौंसुलेट जनरल ने संगीता का पता लगाने के लिए अमेरिका से मदद मांगी।
2013, 4 सितम्बर: अमेरिका के राज्य विभाग ने भारतीय दूतावास को लिखा कि देवयानी का मामला उनके लिए काफी चिंताजनक है।
2013, 8 अक्तूबर: भारतीय दूतावास ने अमेरिका राज्य विभाग को लिखा कि वह अपने इस अनुरोध को दोहराती है कि संगीता अमेरिका में अवैध रूप से बसने का प्रयास कर रही हैं, उसे वापस भेजा जाए।
2013, 12 दिसंबर: देवयानी को गिरफ्तार कर कपड़े उतार कर तलाशी ली गई और बाद में जमानत पर रिहा कर दिया गया।
साभार: एचटी

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