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चुनावी वायदे से आगे की हकीकत

निजी दूरसंचार कंपनियों की ऑडिटिंग के संबंध में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को लेकर बहस गरम है कि कैग तमाम कंपनियों के खातों की जांच कर सकता है। अदालत का निर्णय एक खास संदर्भ में है और वह यह है कि दूरसंचार विभाग और निजी टेलीकॉम कंपनियों के बीच जो करार हुआ है, उसकी शर्तों के मुताबिक, ‘रेवेन्यू शेयरिंग’ से संबंधित खाते की ऑडिटिंग की जांच का अधिकार सीएजी को सौंपा गया है। सीएजी ऐक्ट के प्रावधानों के तहत रेवेन्यू शेयरिंग से संबंधित खातों में मामले यह आदेश दिया गया है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि कैग निजी कंपनियों के दूसरे खातों की भी जांच करेगा। यानी जहां सरकार को निजी क्षेत्र की कमाई में हिस्सेदारी का समझौता है, उसकी जांच का यह मामला है। अपनी सीमित समझ के तहत मैं यही जानता हूं कि सीएजी ऐक्ट के तहत नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के पास सरकारी विभागों और सरकारी कंपनियों के अलावा सिर्फ उन्हीं विभागों, संस्थानों और निकायों की ऑडिटिंग का अधिकार है, जिनका गठन विधायिका ने किया हो।

इस फैसले के बाद ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि दिल्ली में विद्युत वितरण में लगी निजी कंपनियों की भी ऑडिटिंग अब मुमकिन हो सकेगी। लेकिन जहां तक मैं समझता हूं, यह एक अलग मामला है। इसके बारे में अदालत में एक याचिका लंबित है और उस पर निर्णय आना अभी बाकी है। इस मामले में सबसे खास बात यह है कि डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों का गठन विधायिका के जरिये नहीं हुआ है, इसलिए सीएजी कानून के सेक्शन-20 के तहत वह नहीं आता। बाकी हमें अदालत के फैसले का इंतजार करना पड़ेगा। अंतिम सुनवाई 22 जनवरी को होने वाली है। दिल्ली में बिजली की दर और वितरण कंपनियों को लेकर जो भी हंगामा मचा है, उस पर गहराई से सोचने की जरूरत है। मूल समस्या यह है कि देश में कोयले के दाम लगातार बढ़ते रहे हैं। सेंट्रल जेनरेटरों ने भी उसी अनुपात में अपने टैरिफ के दाम बढ़ाए। गौर कीजिए, जो भी सेंट्रल जेनरेटर हैं, वे सभी सरकारी हैं।

दिल्ली में 2003-04 में बिजली वितरण का काम निजी क्षेत्र को सौंपा गया था, उस समय प्रति 200 यूनिट तक 1.70 रुपये की दर पर बिजली खरीदी जाती थी। 200 से 400 यूनिट की दर 3.25 रुपये बैठती थी। मौजूदा दौर में प्रति शुरुआती 200 यूनिट पर 3.90 रुपये और 200 से 400 यूनिट के बदले 5.80 रुपये उपभोक्ताओं से वसूले जा रहे हैं। यह रकम बैगर सब्सिडी की है। राज्य सरकार काफी समय से सब्सिडी देती रही है और पिछले साल भी जब बिजली की दर बढ़ाई गई थी, तो सरकार ने प्रारंभिक 200 यूनिट खपत पर 1.20 रुपये की सब्सिडी का ऐलान किया था। और 200 से 400 यूनिट खपत पर 80 पैसे की सब्सिडी की घोषणा की, जो पहले नहीं थी। दरअसल, इस पूरे मामले में मुश्किल यह रही कि पिछले दस-ग्यारह वर्षों में बिजली खरीद में करीब 300 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है। अब ऐसे में आप दाम न बढ़ाएंगे, तो क्या करेंगे? हां, गलती यह हुई कि अगर कुछ-कुछ समय पर नियमित रूप से दाम बढ़ते रहते, तो इतना हंगामा नहीं मचता।

पहले 2006 से 2011 तक दाम नहीं बढ़ने दिए गए और जब दो बार में बड़ी बढ़ोतरी करनी पड़ी, तो लोगों को झटका-सा लगा। दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने अपने चुनावी वायदे में बिजली-पानी के मसले को जोर-शोर से उठाया। यह स्वाभाविक था कि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली इन चीजों के प्रति मतदाता आकर्षित हुआ। अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम के लोगों ने अपनी चुनावी सभाओं में लगातार लोगों को यह संकेत दिया कि बिजली के वितरण के मामले में कंपनियां बड़ी भारी हेराफेरी कर रही हैं और हमारी हुकूमत आई, तो हम इन कंपनियों का ऑडिट कराएंगे और बिजली के दाम आधे घटा देंगे। हम डिस्ट्रीब्यूशन में लगी कंपनियों की पैरोकारी नहीं कर रहे, लेकिन जिन खर्चो में उनकी हेराफेरी की गुंजाइश है, वह एरिया कुल बजट का सिर्फ दो प्रतिशत है। इसमें भी वे पूरी दो फीसदी का घपला नहीं कर सकतीं। बावजूद इसके यदि कोई हेराफेरी हुई है, तो निस्संदेह उसकी जांच होनी चाहिए। और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी के खिलाफ एक्शन लिया जाना चाहिए। लेकिन अगर हम सस्ती पब्लिसिटी को एक तरफ रख दें, तो यह भी ध्यान में रखना होगा कि डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी के काम करने का असर सीधे उपभोक्ताओं पर पड़ता है। उस मामले में हमें व्यावहारिक नजरिया अपनाना होगा।

अगर किसी वजह से तीन घंटे तक उपभोक्ताओं को जेनरेटर चलाना पड़ जाए, तो उसका खर्च डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी के इन छोटे-खर्चों से कहीं ज्यादा पड़ेगा। दिल्ली के लोगों को बिजली के दाम में पचास प्रतिशत की कमी का इंतजार है, लेकिन जहां तक मेरी समझ है, इस इंतजार के खत्म होने की कोई सूरत नहीं नजर आ रही है। सेंट्रल जेनरेटरों से इसकी खरीद और फिर उपभोक्ताओं के घरों तक इसकी सप्लाई में जो खर्च बैठता है, उसके गणित पर ध्यान देने के बाद यह कतई संभव नहीं लगता कि इसकी दरों में इतनी बड़ी कटौती की जा सकती है। हालांकि नई सरकार ने कटौती की घोषणा कर दी है, लेकिन वह अपने ऐलान को किस तरह से अमल में लाती है, यह अभी देखना होगा।

उपभोक्ताओं और दिल्ली की जनता को राहत मिले, इसमें भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती है, लेकिन लोक-लुभावन वायदे करते समय राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को उसके व्यावहारिक पक्ष को भी ध्यान में रखना चाहिए। आखिर जिस जनता के कल्याण के लिए आप वायदे करते हैं और उसे अपने पक्ष में खड़ा करते हैं, वायदे पूरे न होने की सूरत में वह उतनी ही तेजी से दूर भी होती है। टेलीकॉम कंपनियों के मामले में भी दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का विकल्प अभी खुला है। संभव है कि संबंधत कंपनियां ऊपरी अदालत में जाएं। फिलहाल इस फैसले को सीमित अर्थो में ही देखा जाना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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