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कैबिनेट की बैठक में संत समागम

इधर तमाम मुख्यमंत्रियों के बारे में पढ़ो, सुनो, देखो, तो लगता है कि संत-समागम की खबरें आ रही हैं। कोई  सिक्योरिटी नहीं ले रहा, किसी ने सिक्योरिटी कम कर दी। कोई छोटी कार में दफ्तर में जा रहा है, तो कोई टैक्सी में दफ्तर जा रहा है। संतई पर उतर रहे हैं सीएम, इसलिए मैं बहुत चिंतित हूं, क्योंकि संतों के लक्षण इन दिनों ठीक नहीं चल रहे हैं। घोटाले जैसे कर्मठतावाले जुर्म में संत अंदर नहीं जा रहे हैं,  वो बहुत ही निष्ट किस्म के संगीन आरोपों में अंदर हो रहे हैं। हे मुख्यमंत्रियों, उन संतों के स्तर तक शत-प्रतिशत मत चले जाना। एक मुख्यमंत्री के चंपू से हुई मेरी विस्तृत बातचीत के कुछ अंश देखें- सीएम साहब ने आज क्या किया? वे अपनी फूस की कुटिया से निकलकर पैदल दफ्तर की ओर निकले। लेकिन सीएम साहब ने किया क्या? पैदल दफ्तर की ओर निकले, और सिक्योरिटी नहीं ली। शाम तक दफ्तर पहुंचे, फिर एक घंटे में वापस निकल लिए पैदल। पर सीएम साहब ने किया क्या? और क्या करेंगे सीएम? इत्ता कर तो दिया।

ये सुनकर दूसरे प्रदेश के सीएम के चंपू बोले- मेरे साहब तो सिर्फ बनियान पहनकर जाते हैं दफ्तर। तेरे तो कोट पहनकर गए। तीसरे प्रदेश की मुख्यमंत्री के चंपू बोले- मेरी मैडम तो नंगे पैर जाती हैं। काम क्या हुआ है यह बताओ? कुटिया-चप्पल विमर्श न करो। बेहतर होगा कि मुख्यमंत्री अपने कामों की वजह से जाने जाएं, न कि कुटिया के आकार प्रकार और उसकी डिजाइन से। न ही इस बात से कि वे कैसे और क्या पहन कर ऑफिस जाते हैं। कुटिया तो संतों की बहुत झेल लीं, इस मुल्क ने। बेहतर यह है कि महाराज आप बंगला-सिक्योरिटी सब ले लो, पर काम पूरा का पूरा करके दिखाओ। आखिर में अपनी उपलब्धियों के नाम पर पब्लिक को सिर्फ यह न बताना कि कुल हमने ये किया- सिक्योरिटी नहीं ली। संत बने रहे। हाय, कितने संत झेलेंगे हम।  उफ्फ संत समागम बंद करें और ढंग से मुख्यमंत्री का काम शुरु कर डालें।

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