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समस्या के आगे

जब आप किसी समस्या से खुद को घिरा पाते हैं, क्या करते हैं? बेंजामिन डिजरायली तो कुछ नहीं करते थे। वे बस शांत हो जाते। थोड़ी देर मस्तिष्क को विराम देते और फिर समस्याओं की ऐसी-तैसी करने का सूत्र पा जाते। जब समस्याएं हमारे पास आती हैं, हम बौखला जाते हैं। डिजरायली कहते थे कि समस्या की रणनीति यही होती है कि हम बौखला जाएं और वह अपनी स्थिति और मजबूत कर ले। बौखलाहट हमारी सोचने-समझने की क्षमता को कम कर देती है और हम गलत निर्णय ले लेते हैं। जैसे ही आपका बॉस आपके प्रतिकूल कोई टिप्पणी करता है, हम आपा खो देते हैं। सामने न सही लेकिन उनके पीछे उनपर तीखी टिप्पणी करने लगते हैं, जो हमारी स्थिति और खराब कर देता है। यह सच है कि किसी भी नकारात्मक टिप्पणी या स्थिति को सहजता से ले पाना टेढ़ी खीर है, लेकिन ऐसा किया जा सकता है। मस्तिष्क को विराम देकर। जाहिर है ऐसे में हमारी जुबान भी शांत रहेगी। रवींद्र नाथ टैगोर मस्तिष्क की हलचल को खत्म करने के लिए प्रकृति के बीच चले जाते। पहाड़ों और वृक्षों के बीच।

हम भी इस तरीके को अपनाते हैं, लेकिन कुछ अलग तरह से। हम साल में एक बार हिल स्टेशन या समुद्र किनारे छुट्टियां मनाते हैं, लेकिन आज के दौर में इतना ही काफी नहीं। हमें मस्तिष्क को रोजाना शांत करने का तरीका सीखना होगा, वरना आपाधापी हमें अच्छा जीवन जीने नहीं देगी। प्रवीण वर्मा ने इस पर एक शानदार किताब लिखी है-‘सक्सेस इज ए स्टेट ऑफ माइंड’। इसमें वे लिखते हैं कि अगर आपका दिमाग शांत व स्थिर नहीं, तो समझिए अच्छे अवसर आपके हाथ नहीं आने वाले। अगर आपको बुरे हालात को हराना है और सफलता की सीढ़ियां चढ़नी है तो भावनात्मक रुप से मजबूत रहना होगा। मूल यही है कि प्रतिकूल हालात में भरपूर सांस लें, स्नायु तंत्र पर काबू रखें और मन-मस्तिष्क को खुला छोड़ दें।

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