DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सादगी और जन भावना

भारतीय समाज का नीति नियंत्रक तत्व किस्सा भी रहा है। दुनिया में इससे बड़ा कोइ समाज नहीं है जो किस्से से संचालित होता रहा हो। कछुआ और खरगोश’ भारतीय समाज की देन है। दुनिया की हर भाषा में इसका अनुवाद हुआ। आज तक इसका परिमार्जन हो रहा है। जातक कथाएं बहुत कुछ बता जाती हैं। आपके मुख्यमंत्री जन भावना की कद्र में लगे हैं। एक कथा सुनें- पंडितजी अपने पोते के साथ एक यात्रा पर थे। उनके साथ एक मरियल-सी घोड़ी थी। पंडितजी घोड़ी पर बैठे थे और उनका पोता घोड़ी की लगाम पकड़कर चल रहा था। वे एक गांव से गुजरे, तो लोगों ने कहा- पंडित बहुत निर्दयी है। अपने तो घोड़ी पर है और छोटे-से बच्चे को पैदल चला रहा है। बात पंडितजी को लग गई। खुद नीचे उतरे आए और पोते को घोड़ी पर बिठा दिया।

अगले गांव ने देखा और बोला-अजीब आदमी है, खुद जईफ है, पैदल चल रहा है और लड़के को ऊपर बिठा दिया है। फिर क्या था, पंडितजी खुद भी घोड़ी पर बैठ गए। अगले गांव के लोगों ने देखा कि घोड़ी पर दोनों बैठे हैं, वहां के लोगों ने ताना मारा- अजीब बेरहम आदमी है। मरियल-सी घोड़ी पर दोनों सवार हैं। पंडितजी नीचे उतर गए, पोते को भी उतारा और घोड़ी को कंधे पर लादकर चलने लगे। अगले गांव के लोगों ने क्या कहा होगा? आप सचेत पाठक हैं, अंदाज लगा सकते हैं। ‘आप’ जनाकांक्षा को पूरा नहीं कर सकते। सादगी बत्ती से नहीं, सलीके से आती है। वह गांधी से सीखना पड़ेगा।
चंचल की फेसबुक वॉल से

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:सादगी और जन भावना