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कामयाब मिसाइल

भारत में ही बनी परमाणु हथियार दागने में सक्षम मिसाइल पृथ्वी-2 का सफल परीक्षण फिर से किया है। इस परीक्षण का महत्व यह है कि अब यह परीक्षण रक्षा अनुसंधान संगठन (डीआरडीओ) ने नहीं किया है बल्कि स्ट्रैटेजिक फोर्स कमांड (एसएफसी) ने किया है जो एक मायने में इस मिसाइल का इस्तेमाल करने वाला है। डीआरडीओ ने इसका परीक्षण काफी पहले कर लिया था और अब सैनिक इस्तेमाल के लिहाज से इसका परीक्षण हो रहा है। इस परीक्षण की सिर्फ निगरानी डीआरडीओ ने की है। भारत का मिसाइल कार्यक्रम काफी सफल है और डीआरडीओ कम से कम इस क्षेत्र में सफलता का दम भर सकता है। इसके अलावा कुछ और छोटी-मोटी सफलताएं ही डीआरडीओ के हाथ लगी हैं। देश में रक्षा सामग्री विकसित करने के डीआरडीओ के कार्यक्रम लगातार आलोचना के शिकार हुए हैं। जिस विजयंत टैंक की चर्चा 25 साल से ज्यादा वक्त से हो रही है वह अभी तक तो नमूदार नहीं हुआ है और निकट भविष्य में उसकी कोई उम्मीद नहीं है। इसी तरह भारत का अपना हलका लड़ाकू विमान भी सिर्फ चर्चा का ही विषय रह गया है। फिर अपने देश में हल्के और भारी हथियार बनाने के कार्यक्रम भी ठोस जमीन पर नहीं आ पाए हैं और भारत आज दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार आयात करने वाला देश बन गया है।

भारत का मिसाइल कार्यक्रम ही इसका अपवाद है। इसकी वजह शायद यह भी है कि भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की सफलता है। इस मायने में पृथ्वी का सफल परीक्षण स्वागतयोग्य तो है ही लेकिन भारतीय रक्षा अनुसंधान और विकास में यह असंतुलन भारतीय राजनैतिक हितों के लिए ठीक नहीं है। परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कभी हो, यह कोई भी नहीं चाहेगा। परमाणु हथियार और उनके इस्तेमाल की तकनीक का महत्व यह है कि वह परमाणु शक्ति संपन्न प्रतिस्पर्धियों से संतुलन बनाए रखता है। परमाणु हथियारों का सिर्फ होना ही दुश्मन को डराने के लिए काफी होता है यह उत्तर कोरिया के उदाहरण से समझा जा सकता है। इसके बरक्स परंपरागत हथियारों का इस्तेमाल करने की जरूरत अक्सर पड़ जाती है और उस नजरिये से हमारी तैयारी में कई खामियां हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत में एक व्यापक रणनीतिक नजरिया राजनैतिक नेतृत्व के पास नहीं है। चीन और पाकिस्तान के प्रति हमारा रवैया भावुकतापूर्ण प्रेम से उग्र राष्ट्रवादी नारेबाजी तक बदलता रहता है। बाकी पड़ोसी देशों के साथ भी हमारे रिश्तों में कोई स्पष्ट नजरिया नहीं दिखता।

हमारी श्रीलंका नीति तमिलनाडु की राजनीति पर निर्भर करती है और बांग्लादेश से संबंध सुधारने की कोशिशें भी फिलहाल स्थगित हैं। यही स्थिति समूची रक्षा और विदेश नीति की है। सेना के लिए हथियार मुहैया कराने में योजना से कार्यान्वयन के बीच इतनी देर हो जाती है कि तब तक जमीनी हकीकत बदल जाती है और सेना की जरूरतें भी बदल जाती हैं। हमारी रक्षा नीति उत्तरी और उत्तर पश्चिमी सीमाओं पर केंद्रित है लेकिन आने वाले वक्त में हिंद महासागर हमारे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण होता जाएगा। शायद इस शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन का केंद्र हिंद महासागर बन सकता है क्योंकि चीन अपने सहयोगी देशों के साथ एक महाशक्ति बन कर उभर रहा है। हिंद महासागर का सबसे बड़ा देश होने के नाते भारत का इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा महत्व होगा। इस तरह भारत को सभी दिशाओं में अपनी रक्षा तैयारियां चौकस करनी होंगी ताकि अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति का हम फायदा उठा सकें। पृथ्वी जैसी मिसाइलों की तैनाती से इस नजरिये से काफी फायदा होगा।

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