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मोबाइल टेक्नोलॉजी और हम

दस साल पहले नेपाल में मोबाइल फोन विचित्र वस्तु थी। भारी-भरकम सेट, ऐंटीना और भद्दा डिस्पले। ये अमीर कारोबारियों के पास होते थे, संपर्कों में रहना इनकी मजबूरी है। एक दशक बाद, आज मोबाइल फोन हर किसी की जेब में मिल सकता है। ये स्लीक हैं, गैजेट्स हैं, प्रोसेसिंग पावर व स्टोरेज स्पेस अधिक है। निश्चित रूप से मोबाइल तकनीक में जबर्दस्त उछाल आया है। 63.6 प्रतिशत नेपाली घरों में मोबाइल फोन हैं, जबकि 61.8 प्रतिशत घरों में शौचालय की सुविधा है। इसका एक मतलब यह है कि ज्यादातर नेपालियों के लिए आज संपर्क और सूचना पहले की तुलना में आसान है। बेतार तकनीक को दुर्गम-दूरस्थ इलाकों तक पहुंचाने में महाबीर पुन का बड़ा योगदान रहा, इसलिए वह दुनिया भर के अखबारों की सुर्खियां बने। लेकिन सरकार को डिजिटल युग में पहुंचने में लंबा समय लग रहा है। अधिकतर सरकारी सेवाओं में, चाहे वह नागरिक सेवा हो या पासपोर्ट या जमीन के मालिकाना हक का प्रमाण-पत्र, लंबी-चौड़ी कागजी कार्यवाही की जरूरत पड़ती है, दस्तावेज पर अंगूठे का निशान लिया जाता है, स्याही-मुहर के बिना काम नहीं चलता और फिर सबको एक जगह जमा किया जाता है।

निजी क्षेत्रों में भी काम की रफ्तार धीमी है। हाल ही में कुछ बैंकों ने मोबाइल बैंकिंग की सीमित सेवा शुरू की है। इन्हीं संदर्भो में विज्ञान, तकनीक और पर्यावरण मंत्रलय ने नेशनल इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (एनआईटी) का नक्शा खींचा है। हालांकि, अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, फिर भी यह स्वागत योग्य है। अभी बताया गया है कि यह ‘मोबाइल गवर्नेस के साथ मोबाइल शिक्षा व सेहत पर केंद्रित है।’ हमें उम्मीद है कि एनआईटी का यह मतलब भी होगा कि अधिक चीजें डिजिटल और सुगम हों, खासकर गांवों में रहने वाले लोगों के लिए। स्थानीय अनुभवों के अलावा, नेपाल के सूचना-तकनीक क्षेत्र को वैश्विक अनुभवों से भी बहुत कुछ सीखना होगा। पड़ोसी देश भारत ने मोबाइल टेक्नोलॉजी में काफी तरक्की की है। इससे लोगों के बीच सूचना का प्रवाह बढ़ा है, बाजार तक सभी की पहुंच है और नौकरशाह अधिक दक्ष हुए हैं। भारत से नेपाल सीखे।   
द काठमांडू पोस्ट, नेपाल

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