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दो टूक

झारखंड में चार सौ एनजीओ को फर्ाी होना सरकार की उस योजना के लिए वज्रपात है जिसके जरिये केंद्र सरकार ने ऐसी संस्थाओं को जन सेवा के पर्याय के रूप में खड़ा करने की प्लानिंग की थी। संस्था कागज पर और खर्च हो गये पांच अरब रुपये। सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में जन कल्याण की दिशा में कार्यरत एनजीओ को इस खबर से झटका लगना स्वाभाविक है। झारखंड में ही कई एनजीओ हैं जिनके कार्यो की मुक्त कंठ से सराहना होती है। लेकिन कुछ संस्थाओं के कागजीपन ने उन्हें भी शक के घेर में ला दिया है। अपनी साफ छवि को बरकरार रखने के लिए जनसेवा में लगी संस्थाओं को आगे आकर कंबल ओढ़ कर घी पीने वाली फर्ाी संस्थाओं को बेनकाब करना होगा। ं

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