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उचाड़ों का बसेरा पूर्णिया का फूलपुर गांव

जिले के बायसी अनुमंडल के डगरुआ प्रखंड अन्तर्गत मुराजपुर और फूलपुर गांव सही मायने में उजड़ों का बसेरा है। जिला मुख्यालय से करीब पच्चीस कि.मी. दूर क्षतिग्रस्त महानंदा तटबंध पर बंजारों की बस्ती की शक्ल में खड़ी सौ के करीब झुग्गी-झोंपड़ियां अपने आप में कटाव की पीड़ा एवं विस्थापन की व्यथा बयां कर रही हैं। दरअसल, किस्तों में आकर यहां आकर बसे हुए लोग पिछले बीस सालों से यह व्यथा झेल रहे हैं। परवान और पनार की अल्हड़ जलधाराओं ने पहले खेती की जमीन लील ली फिर रहने का घर भी नहीं छोड़ा।ड्ढr ड्ढr सन् 1े बाद धीर-धीर वे इस तटबंध पर बस गये जो टूटने के बाद महज एक टापू की शक्ल में है। यहां रहने वाले मो. तैयब बताते हैं कि 87 की बाढ़ में ही यह तटबंध टूट गया था। वे लोग जब यहां बसे थे तब पुनर्वास की बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गयी थी पर न घर मिला न जमीन मिली। पहले किसान थे और अब मजदूर बन कर रह गये हैं। साठ वर्षीय मो. मंसूर कहते हैं कि 10 में प्रखंड के कर्मचारी सव्रेक्षण करने आये थे जो नाम, परिवार की संख्या आदि नोट कर ले गये थे। पूछने पर बताया था कि रहने के लिए जमीन व घर मुहैया कराया जाना है किन्तु आज तक ऐसा कोई लाभ उन्हें नहीं मिला। मुराजपुर और फूलपुर अकेले ऐसे गांव नहीं हैं। बायसी अनुमंडल के अमौर, वैसा, डगरुआ एवं बायसी पूरी तरह बाढ़ प्रभावित हैं। वैसा प्रखंड के मंगलपुर का ही नहीं बायसी में महानंदा के किनार बसा डंगराहा गांव भी उजड़े हुए परिवारों का बसेरा है जिसकी विस्थापना ही नियति है। ये गांव हर साल कहीं महानंदा तो कहीं कनकई, परवान और पनार नदियों के कटाव की चपेट में आते हैं। विडम्बना यह है कि बाढ़ व कटाव से विस्थापित हुए ग्रामीणों को सरकार की किसी योजना का लाभ नहीं मिल सका है। मुख्यमंत्री बाढ़ आवासीय योजना के लिए इस अनुमंडल के तहत 2004-05 में 1230 परिवारों का नाम सव्रेक्षण के बाद सूचीबद्ध किया गया था। जानकार बताते है कि इसके लिए आवंटन मिला और पैसा प्रखंड तक पहुंचा भी। इसके बावजूद मामला अधर में लटका रह गया। क्षेत्र के विधायक प्रवक्ता ने बताता कि यहां मुख्यमंत्री आवास योजना का भी लाभ किसी को नहीं मिल सका है ।

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