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हम हैं, ईश्वर है और हम ईश्वर हैं

स्वामी विवेकानंद भारतीय धार्मिक पुनर्जागरण के पुरोधा हैं। उनके विचार आज भी पूरी तरह प्रासंगिक हैं। यह आलेख उनके एक पत्र के हिंदी अनुवाद का अंश है, जो उन्होंने अपने एक अभिनंदन पत्र के उत्तर में लिखा था। इसमें उन्होंने हिंदू धर्म के यथार्थ स्वरूप का वर्णन किया है।

किसी से ईर्ष्या मत करो। भलाई के काम करने वाले प्रत्येक को अपने हाथ का सहारा दो। तीनों लोकों के जीव के लिए शुभ कामना करो। अपने धर्म के उसी एक केंद्रवर्ती सत्य पर खड़े हो जाओ, जो हिन्दू, बौद्ध और जैनियों के लिए पैतृक संपत्ति है। वह सत्य है मनुष्य की आत्मा- अज, अविनाशी, सर्वव्यापी, अनंत, मानवात्मा। जिसकी महिमा का वेद भी वर्णन नहीं कर सकते, जिसके वैभव के सामने सूर्य-चंद्र, तारागण और नक्षत्रसमूहों के साथ सारा विश्व एक बिंदु के समान है। प्रत्येक स्त्री-पुरुष, यही नहीं, उच्चतम देवों से लेकर पैरों के तले के कीड़े-मकोड़े तक सभी वही आत्मा- विकसित या अविकसित हैं। अंतर प्रकार में नहीं, परिणाम में है।

आत्मा की इस अनंत शक्ति का प्रयोग जड़ वस्तु पर होने से भौतिक उन्नति होती है, विचार पर होने से बुद्धि का विकास होता है और अपने पर ही होने से मनुष्य का ईश्वर बन जाता है। पहले हमें ईश्वर बन लेने दो। उसके बाद दूसरों को ईश्वर बनाने में सहायता देंगे। ‘बनो और बनाओ’ यही हमारा मूल मंत्र रहे। ऐसा न कहो कि मनुष्य पापी है। उसे यह बताओ कि तू ब्रह्म है। यदि कोई शैतान हो तो भी हमारा कर्तव्य यही है कि हम ब्रह्म का ही स्मरण करें, शैतान का नहीं।

यदि कोठरी में अंधकार है तो सदा अंधकार का अनुभव करते रहने और अंधकार अंधकार चिल्लाते रहने से तो वह दूर नहीं होगा, बल्कि प्रकाश को भीतर लाइए, तब वह दूर हो जाएगा। यह तो हमें समझ लेना चाहिए कि जो कुछ अभावात्मक है, विनाशकारी है और केवल दोष देखने वाला है, उसका अंत अवश्यम्भावी है और जो भावात्मक, सत्यात्मक और रचनात्मक है, वही अमर है और वही सदा रहेगा। हम यही कहें- ‘हम हैं’, ‘ईश्वर हैं’ और ‘हम ईश्वर हैं।’ ‘शिवो़डहम शिवोडहम’कहते हुए आगे बढ़ते चलिए। जड़ नहीं, वरन् चैतन्य हमारा लक्ष्य है। नाम और रूप वाले सभी नामरूपहीन सत्ता के अधीन हैं। इसी सनातन सत्य की शिक्षा श्रुति दे रही है। प्रकाश को ले आइए, अंधकार आप ही आप नष्ट हो जाएगा। वेदांतकेसरी गजर्ना करे, सियार अपने बिलों में छिप जाएंगे। भावों को सब ओर बिखेर दीजिए और फल अपने आप होता रहेगा। भिन्न-भिन्न रासायनिक द्रव्यों को एक साथ डाल दीजिए, उसकी सम्मिश्रण-क्रिया आप ही आप होती रहेगी। आत्मा की शक्ति का विकास कीजिए और सारे भारतवर्ष के विस्तृत क्षेत्र में उसे डाल दीजिए और जिस स्थिति की आवश्यकता है, वह आप ही आप प्राप्त हो जाएगी।

अपने अंतर में व्याप्त ब्रह्म भाव को प्रकट कीजिए और उसके चारों ओर सब कुछ अनुकूल जुट जाएंगे। वेदों में बताए इंद्र और विरोचन के उदाहरण को याद रखिए। दोनों को अपने ब्रह्मत्व का बोध कराया गया था, परंतु असुर विरोचन अपनी देह को ही ब्रह्म मान बैठा। इंद्र तो देवता थे, वे समझ गए कि वास्तव में आत्मा ही ब्रह्म है। आप तो इंद्र की संतान हैं। आप देवताओं के वंशज हैं। जड़ पदार्थ आपका ईश्वर कदापि नहीं हो सकता। भारतवर्ष का पुनरुत्थान होगा, पर वह जड़ की शक्ति से नहीं, वरन् आत्मा की शक्ति द्वारा। वह उत्थान विनाश की ध्वजा लेकर नहीं, वरन् शांति और प्रेम की ध्वजा से, संन्यासियों के वेश से, धन की शक्ति से नहीं, बल्कि भिक्षापात्र की शक्ति से संपादित होगा। ऐसा मत कहो कि हम दुर्बल हैं, कमजोर हैं। आत्मा सर्वशक्तिमान है।

(पुस्तक ‘हिन्दू धर्म के पक्ष में’ से)
प्रस्तुति: प्रीति शर्मा

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