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धर्म का पथ ही विकास का मार्ग

धर्म क्या है? धर्म का आदेश क्या है?
तुम्हारे जीवन को जो धारण किए हुए है, अथवा तुम जिसको धारण किए हुए हो, वही है धर्म। धर्म तुम्हारे जीवन का धारक है। जैसे मछली के जीवन का धारक है पानी, वैसे ही जीवन का धारक है धर्म। धर्म नहीं सिखाएगा पाशविक व्यवहार। धर्म उदार होगा, क्योंकि भगवान के लिए सब अपना है, कोई पराया नहीं। इसलिए धर्म भेद-विभेद नहीं सिखाएगा। धर्म भाईचारा सिखाएगा। धर्म छुआछूत नहीं सिखाएगा। धर्म ऊंच-नीच का भेद नहीं सिखाएगा, क्योंकि धर्म की वाणी सुनोगे, सीखोगे तो किससे, भगवान से।

धर्म क्या है? मानव का धर्म है- मानव धर्म अर्थात् भागवत धर्म और यह धर्म आज का नहीं है। जब से मनुष्य ने जन्म लिया, तब से ही यह धर्म है। इसका आदि कहां है। मनुष्य की जहां से सृष्टि हुई, वहीं इसका आदि है, इसलिए इसको हम सनातन धर्म भी कहते हैं। यह भागवत धर्म है- विस्तार, रस और सेवा। भागवत धर्म का मुख्य लक्ष्य क्या है? मानसिक विस्तार- जब मनुष्य आध्यात्मिक साधना करता है तो उसके मन का स्तर विकसित होता है, जिसे हम वास्तव में विस्तार कहते हैं। रस का अर्थ है अनुभव करना कि ईश्वर का जो प्रवाह है, हम उससे अलग नहीं हो सकते। हमको उसी तरंग में बह जाना है। उसी तरंग के अनुसार आगे बढ़ना है। उन्हीं के रस प्रवाह में हमें चलना है। तीसरा है सेवा। सेवा का अर्थ है बिना शर्त किसी को कुछ देना। यहां सेवा का अर्थ है अपने आपको ईश्वर के चरण में पूर्ण रूप से समर्पित करना। धर्म व्यावहारिक है, सैद्धांतिक नहीं। कौन धार्मिक हैं, कौन नहीं हैं, यह उनकी विद्या से, उनकी बुद्घि से, उनकी पद-मर्यादा से प्रमाणित नहीं होता, बल्कि प्रमाणित होता है उनके आचरण से। साधना के द्वारा जब मनुष्य का मानसिक स्तर विकसित होने लगता है, उसके बाद उसमें आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है। तब व्यवाहारिक जगत में भी विकास होता है। पुन: मनुष्य में जगत के सभी प्राणियों के प्रति प्रेम और सेवा भाव जग उठता है। वैसे कहा भी गया है कि दूसरों की सेवा करना ही मनुष्य का परम धर्म है- यही है भागवत धर्म का वास्तविक अर्थ। धर्म अगर साथ है तो सब कुछ तुम्हारे साथ है। मनुष्य का एक ही मित्र है, वह है धर्म, जो मृत्यु के बाद भी साथ रहता है। धर्म को हमेशा हर हालत में मान्यता देनी है। जब जीव धर्म को मान्यता नहीं देता, धर्म के सामने और किसी को मान्यता दे देता है तो क्या होता है? धर्म की ग्लानि होती है। धर्म की ग्लानि नहीं होनी चाहिए। धर्म का जो पथ है, वह विकास का पथ है।

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