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नवारंभ का संकेत भी है मृत्यु

मृत्यु शुभ है या अशुभ? इसकी आध्यात्मिक व दार्शनिक व्याख्या क्या है?
-गौतम कुमार मिश्र, कदराचक, बांका, बिहार

मृत्यु शब्द ही नकारात्मक भाव के साथ-साथ डराने वाला होता है। मृत्यु का अर्थ है किसी चीज का अंत, चाहे वह जीवन हो अथवा जीवन का कोई आयाम। आध्यात्मिक टर्म में मृत्यु एक अवस्था अथवा आयाम से दूसरी अवस्था में प्रवेश की स्थिति है। यदि जन्म हुआ है तो मृत्यु भी निश्चित है और इससे डरना नहीं चाहिए। चूंकि हम मृत्यु के अनुभव को समझते नहीं, अत: इससे भयभीत होते हैं। हम अज्ञात से डरते हैं। आध्यात्मिक रूप से जीवन को चैतन्य बनाए रखने वाली तथा शरीर को धारण करने वाली सूक्ष्म शक्ति अर्थात आत्मशक्ति होती है। इसे प्राण अथवा श्वास भी कहा जाता है। जब भौतिक शरीर से सूक्ष्म शक्ति अथवा प्राण निकल जाते हैं- श्वास रुक जाती है- तो इसी अवस्था को भौतिक शरीर की मृत्यु कहा जाता है। शरीर के पांच कोषों में एक प्राणमय कोष होता है। अन्नों के रासायनिक तत्वों से प्राण की उत्पत्ति होती है। जब आयु बढ़ने लगती है, तब प्राण का निर्माण धीमा पड़ने लगता है। इसी के साथ श्वास की गति भी मंद पड़ने लगती है। शरीर और मस्तिष्क शिथिल पड़ने लगते हैं। मजबूरन प्राण शक्ति भी शरीर को छोड़ देती है। इसी का नाम मृत्यु है।

दार्शनिक व्याख्या के अनुसार मृत्यु आठ प्रकार की होती है- व्यथा, लज्जा, भय, दु:ख, रोग, शोक, अपमान और मरण। इसी व्याख्या के अनुसार हम जीवन में कई बार मरते हैं। इसीलिए अक्सर कहा जाता है कि शर्म से मर गया। मृत्यु तुल्य कष्ट अथवा प्रतिष्ठा की हानि भी मृत्यु ही मानी गई है। मृत्यु शुभ है या अशुभ, यह इस बात पर निर्भर करता है कि मृत्यु के बारे में हम कितना जानते हैं? यदि देहांत की बात करें तो जीर्ण-शीर्ण, जटिल रोग ग्रस्त देह से मुक्ति पाना शुभ है। वहीं अकाल मृत्यु दु:ख पैदा करती है। मृत्यु किसी स्थिति की समाप्ति है, लेकिन ध्यान रखें, यह नवारंभ का संकेत भी देती है।

 

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